‘बारिश में जल भराव हुआ तो अफसरों पर गिरेगी गाज’। रायपुर नगर निगम की बैठक में यह चेतावनी माननीया महापौर जी ने दी। प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया में प्रकाशित-प्रसारित यह खबर चौंकाने वाली थी, क्योंकि जल भराव का काम तो बारिश में ही हो सकता है ग्रीष्मकाल में नहीं और ऊपर से अफसरों पर गिरेगी गाज तो गाज गिरने का काम भी वर्षा काल में ही होता है। महापौर जी की फटकार को जान- सुन- पढ़कर सुधार की आस में जीती आम जनता तो खुश हो ही गई कमाउ पूत अधिकारीगण भी गदगद हो गए। जलदेवी के अनन्य भक्त अधिकारीगण समझ गए कि आने वाली बरसात के पहले ही धनोपार्जन का नया मार्ग प्रशस्त हो रहा है। ऐसा भी संकेत मिला कि जलदेवी भी ‘नारी ही नारी की शत्रु हैÓ का प्रदर्शन कर रही हैं। तभी तो माननीया महापौर मेम के सपने में जलदेवी अलग-अलग रूप लेकर अलग-अलग संकट का चित्र खींच रही है। कभी भीषण गर्मी में जल संकट तो कभी वर्षा काल में बस्तियों में, नालियों में जल भराव से त्राहि-त्राहि करती जनता का रूप धरे सामने आ रही है। वैसे मौसम अनुरूप आने वाली बीमारियों की तरह मौसम अनुरूप जल भी अलग-अलग संकट को लेकर आने में मास्टर है। मजे की बात यह है कि सरकारें आती हैं, जाती हैं और हर सत्ताधारी गद्दीनसीन सरकार, मंत्री और उनके मि_ू संतरी अनादि काल से चली आ रही पुरानी जड़ जमाई हूई उन्हीं उन्हीं समस्याओं के समाधान की ही बातें करती हैं। हर बार बजट में प्रावधान भी रखा जाता है, किंतु समस्याएं अंगद के पावं की तरह जमी रहती हैं। बजट में निहित करोड़ों रूपये की राशि कपूर की भांति हवा में विलीन हो जाती है। दरअसल हमारा देश अटुट भाईचारा में सोता- जागता है। भाईचारा की भावना से ओत-प्रोत है। इसलिए हर एक सरकार के नुमाइंदे बजट के पैसे को खेतों में घुसी इल्लियों की तरह चट कर जाते हैं, पर समस्याओं को ज्यों का त्यों छोड़ देते हैं, ताकि आने वाली सरकार के मंत्रियों- संतरियों को भी उस अजर अमर समस्या के समाधान हेतु बजट में भारी भरकम राशि रखने में सुविधा हो।यह उतना ही सत्य है, जितना कि विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर देश भारत में जनप्रतिनिधियों को चुनाव लडऩे के लिए कोई शैक्षणिक योग्यता अथवा आयु का बंधन नहीं है। अगर इसमें सच्चाई नहीं होती तो छत्तीसगढ़ को बने तो छब्बीस साल हो गए तब भी नगर शहर में समस्याएं जस की तस क्यों हैं। जहां की तहां है। छत्तीसगढ़ बनने के पहले से और छत्तीसगढ़ बनने के बाद से रायपुर शहर के जल भराव वाले स्थलों अथवा जल संकट वाले क्षेत्रों को हरेक वर्ष चिन्हित किया जाता रहा है। अगर रिकॉर्ड खंघाला जाए तो इस मुद्दे पर बहाए गए पैसे और पसीने का ऐतिहासिक आंकाड़ा सामने आएगा,जो कि अनेक शोधार्थियों को पीएचडी दिला सकता है।चमकते चांद में दाग की तरह बदनाम राजधानी रायपुर की गलियां रोती सिसकती कहती हैं – हाय रायपुर तेरी यही कहानी, नालियों में है कचरा और सड़कों पर है गंदा पानी। जलदेवी के आवास बने ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को माननीय जनप्रतिनिधि और ज्ञानी अधिकारीगण विकृत नहीं करते अर्थात उसके स्वरूप को बदलते नहीं हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि जल ही जीवन है। जल भरे तो या जल घटे तो दोनों ही स्थितियां मंत्रियों- संतरियों की कौम के लिए दूधारू गाय है। जिसे दोनों हाथों से दूहने का काम ए मजबूत कौम बखूबी करती आ रही है। सौ ए कौम कभी जल भराव हेतु गड्ढा खोदने के नाम पर तो कभी जल भराव रोकने हेतु गड्ढा पाटने के नाम पर खूब डमरू बजाती है। इनके लिए हर मौसम में जल जबरदस्त कमाई का जरिया है। जीवन चलाने के लिए जरूरत से ज्यादा धन अर्जन हेतु जल इनका सशक्त श्रोत है। इनके लिए जलभराव का अर्थ जेब भराव होता है। आपदा को अवसर में बदलने में माहिर ऐसे लोग जलभराव आपदा की घड़ी में जेबभराव का अवसर तलाश लेते हैं। इसीलिए यह कौम फायदेमंद जल की सेवा में पसीना बहाते हुए जुटी रहती है। सोते जागते एक ही नारा रटते रहती है- जल है तो कल है। जल को बचायेंगे हम एक बार जल हमें बचाएगा बारम्बार।
नालियों में कचरा-सड़कों पर गंदा पानी – विजय मिश्रा
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