यूपीआई पर एमडीआर शुल्क की चर्चा से बढ़ी चिंता: व्यापारियों पर बढ़ सकता है भुगतान का बोझ

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नई दिल्ली। देश के कानपुर का कपड़ा व्यापारी हो, जयपुर का सुपरमार्केट संचालक हो या किसी हाईवे का पेट्रोल पंप मालिक…तीनों का कारोबार अलग-अलग है, लेकिन चिंता एक समान है। 15 अक्तूबर से 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआई भुगतानों पर लगने वाले एमडीआर शुल्क के बाद उन्हें अपने मुनाफे, कीमतों और भुगतान का नया हिसाब लगाना पड़ेगा।

नवीन गुप्ता पिछले 11 साल से कानपुर के सीसामऊ बाजार में रेडीमेड कपड़ों की दुकान चला रहे हैं। पहले ग्राहक नकद देते थे, फिर कार्ड मशीन आई और अब 70 फीसदी भुगतान यूपीआई से होता है। त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है लेकिन इस बार उन्हें कपड़ों की बिक्री से ज्यादा चिंता यूपीआई के नए खर्च की है। वह कहते हैं कि अगर 3,000-5,000 रुपये के ज्यादातर बिल यूपीआई से चुकाए जाएंगे और उन पर शुल्क लगेगा, तो या तो उन्हें अपना मार्जिन कम करना होगा या फिर किसी दूसरे तरीके से लागत निकालनी होगी। उनके जैसे लाखों व्यापारी अब यही हिसाब लगा रहे हैं कि डिजिटल भुगतान की सुविधा का खर्च आखिर कौन उठाएगा।

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व्यापारियों ने सुनाया अपना दुखड़ा:
जयपुर के गांधी मार्केट में सुपर स्टोर संचालक रोशनलाल बताते हैं कि उनका मासिक यूपीआई लेनदेन 80 लाख रुपये से ज्यादा है। अगर हर बड़े भुगतान पर अतिरिक्त लागत जुड़ती है तो उन पर एक लाख का बोझ पड़ सकता है। यह चिंता सिर्फ खुदरा कारोबार तक सीमित नहीं है। ऑल इंडिया पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन से जुड़े ब्रजकिशोर शर्मा कहते हैं, कारोबार बड़ा दिखता है लेकिन मुनाफा उतना नहीं होता। यदि हर बड़े डिजिटल भुगतान पर शुल्क देना पड़े तो पेट्रोल पंपों को रोजाना करोड़ों की चोट पड़ेगी।

त्योहारी सीजन से पहले बड़ा झटका:
खुदरा व्यापारियों के संगठन रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, यह कदम त्योहारी सीजन से ठीक पहले आया है, जब व्यापारियों को सबसे ज्यादा बिक्री की उम्मीद होती है। क्लोदिंग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का कहना है कि पहले से दबाव झेल रहे व्यापारियों के लिए यह नया खर्च चुनौती बन सकता है। उधर फिनटेक कंपनियों की दलील है कि मुफ्त सेवा हमेशा नहीं चल सकती। एक बड़े फिनटेक अधिकारी ने कहा, लोगों को सिर्फ क्यूआर कोड दिखता है, लेकिन उसके पीछे विशाल नेटवर्क काम करता है। सर्वर, सुरक्षा, निगरानी और तकनीकी निवेश भी चाहिए।

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असल लड़ाई 0.4% एमडीआर की नहीं:
पेट्रोल पंप, रिटेल, कपड़ा और उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़े संगठनों ने सरकार के सामने अपनी चिंताएं रखनी शुरू कर दी हैं। कुछ उद्योग संगठनों का कहना है कि डिजिटल भुगतान की सफलता का सबसे बड़ा कारण उसकी मुफ्त उपलब्धता रही है। यदि व्यापारी पर अतिरिक्त बोझ बढ़ा तो छोटे कारोबारियों में नकद भुगतान को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति लौट सकती है। उद्योग संगठन फिक्की से जुड़े विशेषज्ञ चिन्ना राजशेखर कहते हैं, एमडीआर की लड़ाई सिर्फ 0.4 फीसदी शुल्क की नहीं है। बड़ा सवाल है यह कि भारत की डिजिटल भुगतान क्रांति का अगला अध्याय किसके पैसे से लिखा जाएगा…सरकार, बैंक, फिनटेक कंपनियां, व्यापारी या आखिरकार ग्राहक। ,