होर्मुज में अमेरिकी युद्धपोत और सऊदी में सैनिकों की तैनाती, ट्रंप के अगले कदम पर नजर

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वाशिंगटन। अमेरिका और ईरान युद्ध को शुरू हुए अब सात महीने से ज्यादा समय हो चुका है। सैन्य क्षमता में अपने से कई गुना छोटी ताकत ईरान के सामने अमेरिका का कोई बड़ी कामयाबी हासिल न कर पाना उसके लिए अब चिंता का मुद्दा बन गया है। खासकर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रिपब्लिकन पार्टी के लिए, जिन्हें अब अगले महीने मध्यावधि चुनाव का सामना करना है। यह चुनाव भले ही ट्रंप के पद या उनकी शक्तियों पर सीधा असर न डालें, लेकिन इन्हें राष्ट्रपति के दो साल के कार्यकाल और नीतियों की बड़ी परीक्षा कहा जा रहा है। खासकर ईरान संघर्ष में अमेरिका की अब तक की मुश्किलें ट्रंप के कार्यकाल के कई कामों पर भारी पड़ती दिख रही है और अमेरिकी जनता ने खुलकर राष्ट्रपति की युद्ध नीति का विरोध किया है।

ईरान युद्ध को लेकर अपनी घटती लोकप्रियता और मध्यावधि चुनावों की चिंता के बीच अब ट्रंप प्रशासन पर्दे के पीछे कुछ बड़ी तैयारियां करता दिख रहा है। हालिया समय में इससे जुड़े कुछ संकेत भी मिले हैं, जिनमें एयरक्राफ्ट कैरियर को खाड़ी देशों के करीब भेजना, सैनिकों की अतिरिक्त तैनाती, आदि। माना जा रहा है कि ट्रंप गुपचुप तरीके से ईरान से निपटने की योजना बना रहे हैं। आइये जानते हैं कि अमेरिका में ईरान युद्ध को लेकर हालिया समय में क्या-क्या हुआ है? इन तैयारियों का सीधा रिश्ता मध्यावधि चुनाव से कैसे जुड़ा है? अमेरिका की गुप्त योजनाओं को लेकर ईरान क्या कर रहा है?

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पहले जानें- अमेरिका में ईरान संघर्ष को लेकर पर्दे के पीछे क्या-क्या हो रहा?
अमेरिका में ईरान संघर्ष को लेकर पर्दे के पीछे रणनीतिक, सैन्य और राजनीतिक स्तर पर कई गोपनीय गतिविधियां चल रही हैं।

गुप्त बैठकों का दौर कब-कहां हुआ?

  • उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कैंप डेविड में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वरिष्ठ राष्ट्रीय सुरक्षा टीम की कई घंटे लंबी अघोषित बैठक की अध्यक्षता की।
  • बैठक में विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, सीआईए निदेशक जॉन रैटक्लिफ और शीर्ष सैन्य प्रमुख डैन केन शामिल थे।
  • बैठक में ईरान नीति के साथ-साथ यमन में सऊदी-हूती संघर्ष पर गोपनीय चर्चा की गई और आगे के रणनीतिक विकल्पों को अंतिम रूप दिया गया।

पश्चिम एशिया में अमेरिका का कितना सैन्य जमावड़ा?

  • अमेरिका पश्चिम एशिया में 9,000 से 10,000 अतिरिक्त अमेरिकी सैन्यकर्मियों को भेज रहा है। इसमें एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट पर तैनात स्ट्राइक ग्रुप और यूएसएस मेकिन आइलैंड पर तैनात एम्फीबियस ग्रुप शामिल हैं।
  • एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस जॉर्ज एचडब्ल्यू बुश और यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन पहले से ही इस क्षेत्र में तैनात हैं, जिनके सहयोग के लिए यूएसएस बॉक्सर एम्फिबियस ग्रुप भी समुद्री अभियानों के लिए जुड़ा है।
  • इस नए जमावड़े के बाद पश्चिम एशिया में अमेरिका के पास कुल तीन एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और दो एम्फिबियस ग्रुप मौजूद हैं। इसके अलावा ईरान के जवाबी हमलों से सुरक्षा के लिए अतिरिक्त पैट्रियट एयर-डिफेंस सिस्टम भी तैनात किए जा रहे हैं।

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मध्यावधि चुनाव से कैसे जुड़ी पर्दे के पीछे हो रही इन तैयारियों की कड़ी?
चुनाव से पहले बढ़ती महंगाई बनी सिरदर्द

  • अमेरिका में ईरान नीति और सैन्य तैयारियों का सीधा संबंध आगामी मध्यावधि चुनावों से जुड़ा हुआ है। दरअसल, ईरान संघर्ष की वजह से अमेरिका में पेट्रोल और डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसके असर से उत्पाद महंगे हो रहे हैं और अमेरिका में महंगाई दर काफी उच्च स्तर पर है।
  • हालिया सर्वेक्षणों के मुताबिक, 10 में से 9 मतदाता मानते हैं कि ईरान संघर्ष की वजह से तेल की कीमतें बढ़ी हैं। रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कैनेडी सहित अन्य नेताओं ने माना है कि ईरान युद्ध के कारण मुद्रास्फीति फिर से बढ़ रही है, जिससे चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।

जनमत और राष्ट्रपति की अप्रूवल रेटिंग

  • क्विनिपियाक पोल के मुताबिक, पंजीकृत मतदाताओं में से सिर्फ 28% ट्रंप की ओर से युद्ध से निपटने के तरीके का समर्थन करते हैं, जबकि 66% लोग इसे नापसंद करते हैं। इसका असर मध्यावधि चुनाव में पड़ने की आशंका है।
  • डेमोक्रेटिक नेताओं, जैसे सीनेटर मार्क केली का आरोप है कि प्रशासन ने बिना किसी स्पष्ट रणनीतिक लक्ष्य या ‘एग्जिट प्लान’ के युद्ध शुरू किया, जिससे गोला-बारूद खत्म हो रहा है और जनता पर महंगाई का बोझ पड़ा है।

अमेरिका में हालिया समय में हुए सर्वेक्षणों में ट्रंप की ईरान नीति की भारी आलोचना हो रही है। सीएनएन और एसएसआरएस के एक हालिया सर्वे में सामने आया है कि अमेरिका में हर तीन में से दो लोगों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ईरान के खिलाफ युद्ध नहीं जीत रहा है और राष्ट्रपति इस संघर्ष को खत्म करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा पा रहे हैं। बताया जा रहा है कि अमेरिकियों की ट्रंप से युद्ध को लेकर इस नाखुशी का नतीजा मध्यावधि चुनाव में दिख सकता है। अमेरिकी संसद के दोनों सदनों- प्रतिनिधि सभा और सीनेट की सीटों पर होने वाले चुनावों में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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सैन्य समुदायों और चुनावी क्षेत्रों पर असर
यह संघर्ष विशेष रूप से सैन्य बहुल क्षेत्रों में बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। उदाहरण के लिए, वर्जीनिया के दूसरे कांग्रेस क्षेत्र (विश्व के सबसे बड़े नौसेना बेस नॉरफोक के पास) में रिपब्लिकन सांसद जेन किगन्स, जो युद्ध का समर्थन करती हैं और पूर्व डेमोक्रेटिक सांसद एलेन लुरिया, जो युद्ध का विरोध कर रही हैं के बीच कड़ा मुकाबला है।

सैन्य कार्रवाई का समय और राजनीतिक रणनीति

  • ट्रंप ने कहा है कि युद्ध चुनाव के ठीक बाद या उससे पहले भी जीता जा सकता है। तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप भी चुनाव के आसपास ही क्षेत्र में पहुंच रहा है।
  • ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के अनुसार, ट्रंप जानते थे कि उनके फैसलों से अल्पकालिक रूप से ऊर्जा की कीमतें बढ़ेंगी, लेकिन उन्होंने राजनीतिक लाभ के बजाय रणनीतिक फायदे को प्राथमिकता दी।

तो क्या राजनयिक कोशिशों का दौर अब खत्म हुआ?
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध को खत्म करने के कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन यह प्रक्रिया फिलहाल गंभीर गतिरोध का सामना कर रही है।

अमेरिका की दोहरी रणनीति बनी संघर्ष बढ़ने की वजह

  • अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट के अनुसार, ट्रंप प्रशासन कूटनीतिक बातचीत और सैन्य व आर्थिक दबाव, दोनों रास्तों को हर समय खुला रखे हुए है।
  • अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप हमेशा रणनीतिक संभावनाओं की योजना बनाने के साथ-साथ सौदेबाजी का रास्ता भी खुला रखते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने अमेरिका आए ईरानी प्रतिनिधिमंडल के दो सदस्यों को देश छोड़ने का आदेश मिलने के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ता देखा गया है।

मध्यस्थता की नाकाम कोशिशें
कतर ने अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते लागू करने और मतभेदों को कम करने की कोशिश में लगा हुआ है। हालांकि, उसे अभी इसमें कोई खास सफलता नहीं मिली है।

दोनों पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं

  • कूटनीतिक वार्ता में गतिरोध तब और बढ़ा जब ट्रंप ने ईरान के उस हालिया प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसके तहत अमेरिकी प्रतिबंधों और होर्मुज की नाकेबंदी में छूट के बदले वह होर्मुज को दोबारा खोलने की पेशकश कर रहा था।
  • विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका के लिए ईरान के साथ व्यापक परमाणु समझौते तक पहुंचना कठिन है, क्योंकि तेहरान खुद को एक परमाणु क्षमता की दहलीज पर स्थित देश मानता है और अपनी इस सुरक्षा गारंटी को छोड़ने को तैयार नहीं है।
  • इसी कड़ी में पश्चिम एशिया में अमेरिका का भारी सैन्य जमावड़ा सिर्फ युद्ध की तैयारी के लिए नहीं, बल्कि वार्ता की मेज पर ट्रंप की सौदेबाजी की ताकत को मजबूत करने के कदम के तौर पर भी देखा जा रहा है। ताकि अगर कूटनीति पूरी तरह विफल हो जाए, तो अमेरिका के पास मजबूत सैन्य विकल्प मौजूद रहें।

अमेरिका की गुप्त योजनाओं को लेकर ईरान क्या कर रहा है?
अमेरिका की बढ़ती सैन्य तैनाती और कैंप डेविड की बैठकों के जवाब में ईरान भी कई मोर्चों पर रणनीतिक और सैन्य तैयारी में जुट चुका है।

  • तेहरान के पास बड़ी संख्या में मिसाइलें और ड्रोन मौजूद हैं। उसकी तरफ से स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि अगर अमेरिका बड़े पैमाने पर फिर से सैन्य हमले शुरू करता है, तो वह और भी कड़ा और तीव्र जवाबी प्रहार करेगा।
  • ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ का कहना है कि जब तक अमेरिका समझौते की शर्तें पूरी नहीं करता, तब तक होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहेगा।
  • अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान कूटनीतिक मेज पर अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है। खासकर अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है कि वह इन्हें छोड़ेगा नहीं, लेकिन इसे हथियार बनाने के स्तर पर भी नहीं ले जाएगा।

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