छत्तीसगढ़ी भाषा : प्रगति एवं वर्तमान स्वरूप-डॉ.माणिक विश्वकर्मा

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छत्तीसगढ़ी भाषा का इतिहास सदियों पुराना है। प्रसिद्ध साहित्यकार प्यारेलाल गुप्ता ने अपनी पुस्तक प्राचीन छत्तीसगढ़ में लिखा है कि छत्तीसगढ़ी भाषा अर्धमागधी की दुहिता एवं अवधि भाषा की सहोदरा है। छत्तीसगढ़ी एवं अवधि दोनों का जन्म लगभग 1000 वर्ष पहले अर्धमागधी के गर्भ से हुआ था। किसी भी राज्य के विकास एवं अस्मिता की रक्षा में वहाँ की भाषा का बड़ा योगदान होता है। भाषा केवल अनुभूति को व्यक्त करने का माध्यम नहीं होती अपितु संस्कृति एवं सभ्यता की संवाहक भी होती है। छत्तीसगढ़ के सभी निवासियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा को लोकव्यवहार एवं राजकाज की भाषा बनाना बहुत ज़रूरी है। भाषा मनुष्य एवं समाज की पहचान होती है। भाषा की संरचना बोली से एवं बोली की संरचना बोलने वालों से होती है। 1 नवंबर 2020 को स्वतंत्र छत्तीसगढ़ बनने के बाद से छत्तीसगढ़ी भाषा के विकास एवं राजभाषा का दजऱ्ा दिलवाने के लिए सरकारीक स्तर पर बहुत से प्रयास हुए हैं यथा 28 नवंबर को राजभाषा संशोधन विधेयक 2007 का पारित होना जिसमें हिन्दी के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी को भी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता दी गई, दिनांक 11 जुलाई 2008 को राजभाषा संशोधन अधिनियम 2007 का छत्तीसगढ़ राजपत्र में प्रकाशन, 14 अगस्त 2008 में राजभाषा आयोग का उद्घाटन एवं राजभाषा आयोग द्वारा आयोजित विभिन्न आयोजनों में समय- समय पर की जा रही परिचर्चाएं, बैठकें, काव्य पाठ एवं पत्राचार आदि। किसी भी भाषा को सर्वजन की भाषा बनाने के लिए उसका मानकीकरण होना ज़रूरी होता है। बिखरी हुई भाषाओं को एकीकृत करके मानक के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया को मानकीकरण कहते है। किसी भी मानक भाषा हेतु कुछ बुनियादी चीजों की आवश्यकता होती है जिनमें मान्यता प्राप्त शब्दकोश, व्याकरण, उच्चारण, भाषायी संस्था का प्रमाण पत्र जो मानकों के विश्लेषण के आधार पर भाषा की शैक्षणिक योग्यता को दर्शाती हो। इसके अंतर्गत विभागीय भाषा के रूप में संवैधानिक स्थिति, जनता द्वारा प्रभावशाली उपयोग के पर्याप्त आँकड़े, न्यायालय, विधान परिषद एवं विद्यालयीन क्षेत्र में उपयोग की प्रमाणिकता, भाषा के उपयोग के आधार पर साक्षरता का पैमाना, बोलने में सुलभता की सुनिश्चितता, संप्रदाय में इसके बोले जाने वालों की संख्या एवं स्वीकारोक्ति, समाचार पत्र- पत्रिकाओं एवं मीडिया में इसका प्रयोग करनेवालों की संख्या आदि प्रमुख है। छत्तीसगढ़ी भाषा संबंधित उल्लेखनीय कार्यों में हीरालाल काव्योपाध्याय द्वारा 1885 में छत्तीसगढ़ी व्याकरण, जी.ए. गियर्सन द्वारा 1890 में लिखित ए ग्रामर आफ छत्तीसगढी डायलेक्ट, लोचन प्रसाद पाण्डेय द्वारा 1921 में ए ग्रामर आफ छत्तीसगढी-डायलेक्ट, ई डब्ल्यू मेनजेल द्वारा 1939 में छत्तीसगढी वर्ड्स एंड डिक्शनरी, भालचंद्र राव तैलंग द्वारा 1966 में छत्तीसगढ़ी, हल्बी, भतरी, गोंड़, बोलियों का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन, कांति कुमार द्वारा 1969 में छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण और कोश, शंकर शेष द्वारा 1973 में छत्तीसगढ़ी का भाषा शास्त्रीय अध्ययन, मन्नूलाल यदु द्वारा 1979 में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियां का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन एवं डॉ.विनय कुमार पाठक व डॉ. विनोद कुमार वर्मा द्वारा सन 2018 में रचित छत्तीसगढ़ का संपूर्ण व्याकरण प्रमुख हैं। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा भौगोलिक एवं जातिगत आधार पर अनेक प्रकार से प्रदेश में अलग-अलग ढंग से बोली एवं उच्चारित की जाती है। इसीलिए भाषा के बोलने एवं लिखने में आने वाले विभेद को मानकीकरण के दौरान ध्यान में रखने की आवश्यकता है। मैं बहुत पहले से कह रहा हूँ कि जहाँ भी छत्तीसगढ़ी शब्द के प्रयोग से अर्थ बदलने की संभावना हो वहाँ हिन्दी या प्रचलित शब्द का प्रयोग होना चाहिए हालांकि जिला स्तर पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग की इकाई गठित करने के सुझाव की तरह आजकल इसे भी लगभग मान लिया गया है। छत्तीसगढ़ी भाषा के आठवीं अनुसूची में शामिल होने से अकैडमिक परीक्षाएं एवं स्कूल, कॉलेजों की किताबें छत्तीसगढ़ी में, उपलब्ध हो जाएंगी साथ ही कवि एवं साहित्यकार साहित्य अकादमी जैसे अवॉर्ड तथा यहाँ की फिल्में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय अवार्ड के लिए दावेदार हो जाएंगी। उदासीनता एवं उपेक्षा की भावना को त्यागकर छत्तीसगढ़ में हिन्दी एवं अंग्रेजी के साथ प्रचार-प्रसार, विज्ञापन, प्रस्तुतीकरण, साक्षात्कार, समाचार, सिनेमा हाल, क्रय- विक्रय , टोल टैक्स , कचहरी ,दफ़्तर एवं यातायात आदि में छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग आवश्यक हो जाना चाहिए।उपरोक्त क्रियान्वयन से मानकीकरण की प्रक्रिया आसान होगी। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा बने 18 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन आज भी उसे प्रदेश में उचित सम्मान नहीं मिल पाया है।ज़रूरत है ठोस समाधान निकालने की और सहीं दिशा में पहल करने की। छत्तीसगढ़ की कुल आबादी की लगभग 80 प्रतिशत जनता बातचीत के लिए छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग करती है। भाषा के इतिहास के आधार पर देखें तो छत्तीसगढ़ी साहित्य का जितना विकास होना था उतना हो नहीं पाया है। आज छत्तीसगढ़ी साहित्य में ज़रूरत है नयी विचारधारा, नयी सोच एवं नये चिंतन की जो यहाँ की संस्कृति के साथ ही क्षेत्र के विकास में भी सहायक हो।सिफऱ् पुराने सेट फार्मेट एवं सेट लोगों के बलबूते काम करने से छत्तीसगढ़ी भाषा 22 आधिकारिक भाषाओं के साथ आठवीं अनुसूची में शामिल होने की हक़दार नहीं बन पाएगी।