दिल्ली में यमुना रिवरफ्रंट योजना पर उठे सवाल, साबरमती मॉडल से बढ़ सकता है बाढ़ का खतरा; 18 विशेषज्ञों ने जताई चिंता

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नई दिल्ली। दिल्ली में यमुना नदी के किनारे साबरमती की तर्ज पर 52 किलोमीटर लंबा रिवरफ्रंट विकसित करने की प्रस्तावित योजना को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। उनका मानना है कि साबरमती और यमुना की भौगोलिक व पारिस्थितिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। ऐसे में साबरमती मॉडल को यमुना पर लागू करने से नदी की प्राकृतिक संरचना, बाढ़ के पानी को समाहित करने की क्षमता और खादर क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इससे भविष्य में दिल्ली में बाढ़ का खतरा बढ़ने की आशंका है।

इस संबंध में जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग के सेवानिवृत्त सचिव शशांक शेखर, पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा समेत 18 जल विज्ञानियों ने केंद्र और दिल्ली सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को पत्र लिखा है। इसमें केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल और भूपिंदर यादव, उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता तथा दिल्ली सरकार के मंत्रियों प्रवेश वर्मा और मनजिंदर सिंह सिरसा से परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग की गई है।

दोनों नदियों की प्रकृति अलग, साबरमती मॉडल पर सवाल
विशेषज्ञों के अनुसार, साबरमती अरावली पर्वतमाला से निकलने वाली मौसमी नदी है, जबकि यमुना हिमालय से निकलकर मैदानी क्षेत्र में बहने वाली जलोढ़ नदी है। अहमदाबाद में साबरमती के शहरी हिस्से में नर्मदा नहर के जरिए पानी पहुंचाया जाता है और वासना बैराज से नदी के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है। इसके विपरीत, दिल्ली में यमुना गैर-मानसूनी अवधि में पर्याप्त जलप्रवाह की कमी और प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों नदियों की परिस्थितियां अलग होने के कारण साबरमती में अपनाई गई व्यवस्थाओं को यमुना पर लागू करना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यमुना दिल्ली से आगे भी कई राज्यों से होकर गुजरती है, इसलिए नदी के पानी के प्रवाह और प्रदूषण प्रबंधन से जुड़े विकल्पों का अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।

खादर क्षेत्र में निर्माण से बढ़ सकती है बाढ़ की आशंका
विशेषज्ञों ने वर्ष 2023 और 2025 में दिल्ली में आई बाढ़ का हवाला देते हुए यमुना की बाढ़ वहन क्षमता की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है। उनका आशंका है कि नदी में तलछट और मलबा जमा होने से नदी तल ऊंचा हो सकता है, जिससे पानी के बहाव के लिए उपलब्ध जगह कम हो सकती है। हालांकि, इसकी पुष्टि के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी बताया गया है।

उनका कहना है कि यमुना के खादर क्षेत्र में अतिरिक्त निर्माण और विकास कार्य बाढ़ के पानी के प्राकृतिक फैलाव को रोक सकते हैं। इससे नदी का जलस्तर बढ़ने और आसपास के इलाकों में जलभराव का खतरा पैदा हो सकता है।

एनजीटी के फैसले का दिया हवाला
विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 13 जनवरी 2015 के ‘मैली से निर्मल यमुना’ मामले के फैसले का भी उल्लेख किया है। उन्होंने खादर क्षेत्र की वैज्ञानिक मैपिंग और सीमांकन पूरा करने, ओ-जोन के मौजूदा संरक्षण प्रावधानों को बनाए रखने और अतिक्रमण रोकने की मांग की है।

इसके अलावा भारतीय राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) की वर्ष 2019 की सिफारिश का हवाला देते हुए गैर-मानसूनी अवधि में यमुना का न्यूनतम जलप्रवाह 10 से बढ़ाकर 23 क्यूमेक करने का सुझाव दिया गया है।

परियोजना के दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग
18 विशेषज्ञों ने रिवरफ्रंट परियोजना से जुड़े विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), प्रारंभिक व्यवहार्यता अध्ययन और पर्यावरण प्रभाव आकलन जैसे दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने नदी तल और उसके अनुप्रस्थ क्षेत्र का सर्वेक्षण कर वर्ष 2023 और 2025 की बाढ़ के कारणों की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक करने पर जोर दिया है।विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यमुना रिवरफ्रंट परियोजना पर आगे बढ़ने से पहले नदी की बाढ़ वहन क्षमता, खादर क्षेत्र की भूमिका और पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। उनके मुताबिक, बिना पर्याप्त अध्ययन के साबरमती मॉडल लागू करने से दिल्ली की बाढ़ संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं।