भारत की बहुरंगी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। हालाकि, यही विविधता कभी-कभी राष्ट्रीय नीतियों और प्रांतीय प्राथमिकताओं के बीच टकराव का कारण बन जाती है। हाल ही में तमिलनाडु में जवाहर नवोदय विद्यालयों की स्थापना को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणी ने देश में भाषा, शिक्षा और सहयोगात्मक संघवाद की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्न्ना और न्यायमूर्ति अगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने तमिलनाडु सरकार द्वारा नवोदय विद्यालयों के लिए जमीन उपलब्ध कराने में की जा रही आनाकानी पर सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि तमिलनाडु को हिंदी को लेकर अपनी मानसिकता बदलने की जरूरत है और यह नहीं कहा जा सकता कि तमिलनाडु की धरती पर हिंदी बिल्कुल नहीं पढ़ाई जाएगी। शीर्ष अदालत का यह संदेश बहुत स्पष्ट था कि चेन्नई और दिल्ली के बीच किसी भी प्रकार की अलगाववादी सोच के बजाय संवाद और सहयोग होना चाहिए। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। इसका अर्थ यह है कि केंद्र और राज्य दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में काम करना चाहिए, न कि प्रतिद्वंद्वी के रूप में। राज्य सरकारें अपनी भाषाई नीतियों और संस्कृति के संरक्षण के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को मिलने वाले विश्वस्तरीय अवसरों का केवल भाषाई अवरोधों के कारण विरोध करना छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। जवाहर नवोदय विद्यालय केंद्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत वित्तपोषित ऐसे आवासीय विद्यालय हैं जो मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की मेधावी प्रतिभाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए जाने जाते हैं। इन विद्यालयों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत त्रिभाषा फार्मूला लागू होता है, जिसमें क्षेत्रीय भाषा, अंग्रेजी और हिंदी का समावेश है। तमिलनाडु पिछले कई दशकों से द्विभाषा नीति (तमिल और अंग्रेजी) का पालन करता आ रहा है और हिंदी के किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समावेश को अपनी भाषाई स्वायत्तता पर हमले के रूप में देखता है। परंतु सवाल यह उठता है कि क्या एक अतिरिक्त भाषा सीखने से क्षेत्रीय भाषा का महत्व कम हो जाता है? न्यायालय ने सही कहा कि केंद्र सरकार के विद्यालयों के आने से तमिलनाडु के पहले से मौजूद उच्च शैक्षणिक मानकों में कोई कमी नहीं आएगी, बल्कि यह छात्रों को अतिरिक्त अवसर ही प्रदान करेगा। हिंदी न केवल भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, बल्कि इसमें राष्ट्रभाषा बनने और संपूर्ण देश को एक सूत्र में पिरोने के सभी गुण मौजूद हैं। यह देश के विभिन्न राज्यों के बीच संवाद, व्यापार, रोजगार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सबसे बड़ा माध्यम है। हिंदी का विरोध अक्सर राजनीतिक कारणों से प्रेरित होता है, जबकि आज का युवा वर्ग सीमाओं और भाषाई बंधनों से परे जाकर हर उस साधन को अपनाने के लिए तैयार है जो उसके करियर और विकास में मददगार हो। हिंदी या किसी भी अन्य भाषा को सीखने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि क्षेत्रीय भाषा जैसे तमिल का अनादर किया जा रहा है। तमिल एक प्राचीन, समृद्ध और शास्त्रीय भाषा है, जिसकी अपनी एक महान विरासत है। वास्तविक भाषाई विविधता का सम्मान तब होता है जब एक नागरिक तमिल और हिंदी दोनों के प्रति सम्मान भाव रखे और दोनों के माध्यम से राष्ट्र की प्रगति में योगदान दे। सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी एक चेतावनी भी है और समाधान की दिशा में एक मार्गदर्शक भी। केंद्र और राज्य दोनों को पूर्वाग्रह छोड़कर आपसी बातचीत के जरिए इस मुद्दे को हल करना चाहिए। तमिल संस्कृति और भाषा का संरक्षण जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक देश के ग्रामीण बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने का अवसर देना भी है। भाषा को विभाजन का नहीं, बल्कि जोड़ने का सेतु बनना चाहिए।
हिंदी विरोधी मानसिकता-गिरीश पंकज
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