यही है स्वदेश प्रेम – गिरीश पंकज

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जी हाँ, इसी को कहते हैं स्वदेश प्रेम! पिछले दिनों भारत और न्यूजीलैंड के बीच क्रिकेट मैच में भारत ने सम्मानजनक जीत हासिल की. न्यूजीलैंड की ओर से भारतीय मूल के ईश सोढ़ी खेल रहे थे। वह न्यूजीलैंड में रहते हैं लेकिन उनकी जन्मभूमि तो भारत है। यही कारण है कि जब भारत का राष्ट्रगान बजा तो सोढ़ी की आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। उनके भीतर की भारतीयता जाग उठी। अपने बाल्य काल में न जाने कितनी बार उन्होंने राष्ट्रगान गाया होगा लेकिन किसी कारणवश वे अब न्यूजीलैंड में रह रहे हैं, और वहां की टीम की ओर से क्रिकेट खेलते हैं। यह उनका खेल धर्म था, जिसका वे पालन कर रहे थे। लेकिन राष्ट्रधर्म भी कोई चीज होती है। यही कारण है कि जब भारत का राष्ट्रगान बजा तो सोढ़ी की आँखों से आँसू बहने लगे। यह होता है देश के प्रति प्रेम! दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में ऐसे अनेक एहसानफरामोश और गद्दार लोग हैं जो राष्ट्रगान होने पर खड़े भी नहीं होते। आँसू बहाना तो दूर की बात है। यह अजीब किस्म का देश बनता जा रहा है, जहां देशभक्त कम, गद्दार अधिक नजर आ रहे हैं। राष्ट्रगान सुनकर भावुक होने वाले भी अपने देश में हैं,लेकिन हर व्यक्ति को राष्ट्रगान सुनकर इसी तरह से भावुक होना चाहिए, जैसा भावुक सोढ़ी हुए। दूसरी दुनिया के खिलाड़ी भी जब राष्ट्रगान दोहराते हैं तो उनके चेहरे की भावनाएं हम देखकर समझ सकते हैं कि वे अपने देश को, अपने राष्ट्रगान को कितना प्यार करते हैं। लेकिन हमारे यहां तथाकथित बुद्धिजीवी राष्ट्रगान के सम्मान में न खड़े होने के लिए न जाने कैसे-कैसे तर्क देने लगते हैं। इन तमाम नालायकों को न्यूजीलैंड की ओर से खेलने वाले भारतीय मूल के सोढ़ी को देखकर कुछ तो सबक सीखना चाहिए। कुछ तो शर्मिंदगी महसूस करना चाहिए कि हम राष्ट्रगान के प्रति अवमानना से क्यों भरे होते हैं। वहीं न्यूजीलैंड जाकर बस गया एक भारतीय आज भी राष्ट्रगान सुनकर भावुक हो जाता है,रोने लगता है। ऐसी ही अपनी औलादों को देखकर भारत मां प्रसन्न होती होगी। ऐसे ही महान लोगों के लिए तो कविवर सनेही जी कविता लिखते हैं कि ‘जो भरा नहीं है भावों से जिसमें बहती रसधार नहीं /वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।Ó न्यूजीलैंड के सोढ़ी ने बता दिया कि उनका हृदय भाव से भरा हुआ है। उनका हृदय पत्थर का नहीं है। उसमें आज भी भारतीयता धड़कती है। आज भी वह भारत देश से प्यार करते हैं। अगर नहीं कर रहे होते तो राष्ट्रगान सुनकर उनकी आँखों से आँसू भला क्यों बहते? आँसू बह रहे हैं, इसका मतलब है वह अपनी मां से स्नेह करते हैं। अपनी भारत माता से प्यार करते हैं। भले ही न्यूजीलैंड में रह रहे हैं। वहां के लिए खेल रहे हैं लेकिन हृदय से भारतीय हैं। ऐसे लोगों को जब हम देखते हैं तो गर्व से भर उठते हैं। और बरबस कह उठते हैं वाह-वाह! धन्य हो तुम और धन्य है यह भारत भूमि, जहां ऐसे लाल ने जन्म लिया। और लगे हाथ सबक भी सिखा जाता है उन गद्दार लोगों, को जो इस देश में रहते हैं, इस देश का अन्न खाते हैं, यहां का जल पीते हैं और कहते हैं कि ‘हम भारत माता की जय नहीं बोलेंगे.. वंदे मातरम नहीं बोलेंगे। हम राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं होंगे। पिछले दिनों एक गद्दार मौलाना ने तो यहां तक कह दिया कि अगर भारत-ईरान का युद्ध होगा तो यहां के मुसलमान ईरान के पक्ष में खड़े रहेंगे। दुर्भाग्य की बात है कि ऐसे बयान देने वाले जेल की सलाखों के पीछे क्यों नहीं डाले जाते? भारत के विरुद्ध एक शब्द भी कोई कहता है तो उस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन हमारी तथाकथित उदारता के कारण ही इस देश में गद्दार बढ़ते जा रहे हैं। तुलसीदास जी ने अगर कहा है ‘भय बिन होय न प्रीतÓ,तो गलत नहीं कहा। जब तक हम गद्दारों के प्रति कड़ी कार्रवाई नहीं करेंगे, उनके भीतर देश के प्रति प्रीत नहीं जगेगी। भले ही वह भय से उपजी हो। लेकिन यह प्यार उपजना ही चाहिए। अगर नहीं उपजता,तो ऐसे लोगों को यह देश छोड़ देना चाहिए।