बीड़ी पीते पोते ने दादा को मारा- विजय मिश्रा

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बीड़ी पीते पोते ने दादा को मारा उक्त घटना हाल ही में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के गुढिय़ारी में हुई है। चौंकाने वाली इस घटना ने खूबसूरत देश के बदसूरत होते हाल को चित्रित किया है। सभी जानते हैं कि बीड़ी कोई ऐसी बड़ी अमृत तुल्य चीज नहीं है जिसे पिया जाए और पीकर गौरवान्वित हुआ जाए। दादा और पोते के बीच बीड़ी ने मधुर रिश्ते और मान मर्यादा को तार तार कर दिया है। बुजुर्ग दादा और किशोरवय पोता की यह कथा सामाजिक अनुशासन की टूटती बेडिय़ों के साथ ही बढ़ती नशा प्रवृत्ति का बखान चीख चीख कर रही है। सवाल तो यह भी उठ रहा है कि पोते के हाथ में बीड़ी आई कहां से त्वरित जवाब तो यही लगता है कि पोता के सामने दादाजी बीड़ी का धुआं उड़ाते रहे होंगे। बच्चे तो अकसर बड़ों का ही अनुसरण करते हैं। बड़े लोग अकसर इस बारीक बात को नजर अंदाज कर देते हैं। अपने बचपन की एक घटना मुझे याद आ रही है।एक दिन घर के आंगन में अधजले पड़े सिगरेट के को जलाकर मैं पी रहा था। तभी पिता श्री ने मुझे देख लिया। वे आग बबूला हो उठे मेरे मुंह से सिगरेट को छीनकर मुझे तड़ातड़ दो झापड़ जड़ दिए। फिर बोले – मालूम नहीं सिगरेट पीने से अनेक बीमारियां होती हैं। सिगरेट पीना गंदी बात है। तब रोते-सुबकते आक्रोश व्यक्त करते हुए मैंने कह दिया – आप भी तो सिगरेट पीते हैं। मेरा यह उत्तर उनके सीने में तीखे तीर की तरह लगा था । पल भर को वे तिलमिला गए थे, पर उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और मुझे गले लगाकर वे बोले- हां बेटा गलती मेरी ही है। मेरी देखा देखी ही तुमने सिगरेट को मुंह से लगाया है। सिगरेट सेहत के लिए हानिकारक है। इसलिए सदा सदा के लिए मैं भी सिगरेट पीना आज से बंद करता हूं। इतना कहकर अपनी पेंट के पाकिट में रखे सिगरेट के पैकेट को उन्होंने तोड़ मरोड़ कर कूड़े करकट में फेक दिया था। आजीवन फिर वे कभी भी सिगरेट तंबाकू को मुंह नहीं लगाए। आजकल तो बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, धूम्रपान, मदिरापान, गांजा ,भांग ,अफीम, चरस, कोकिन, ड्रग्स का सेवन आम बात हो गई है। खासकर युवा वर्ग नशा करते हुए स्वयं को आम से खास होने की झूठी कल्पना में मस्त जी रहा है। बहुत सी दु:खद घटनाएं ऐसी भी सामने आ रही हैं, जब माता-पिता, गुरुजनों ने नशा अथवा किसी अन्य अनैतिक कृत्य में लिप्त बच्चे को समझाते – बूझाते डांट फटकार दिया तो भावावेश में आकर बच्चे आत्महत्या जैसे दर्दनाक कदम उठा ले रहे हैं। ऐसी ग़लती करने वाले बच्चे भूल जाते हैं कि गलती को तो सुधरा जा सकता है, किन्तु जिंदगी दुबारा नहीं मिल सकती। बच्चों के ऐसे हृदयविदारक कृत्य से माता-पिता पर दु:खों का पहाड़ टूट पड़ता है। जिससे वे जीवन भर उबर नहीं पाते हैं। नशा को लेकर बच्चे तो देखा सिखी गलती कर लेते हैं, पर बड़े तो इस भ्रम में जीते हैं कि नशा करने से थकान मिटती है । शरीर में चुस्ती फुर्ती आ जाती है। नशेडिय़ों का समूह जब चिलम पीते हैं तो कहते हैं- जम के खींचो चिलम का दम। तुरंत भगेगा मन का गम। यह पूरी तरह से भ्रम ही होता है। ऐसे भ्रम में पड़कर मकड़ी के जाल में फंसे कीड़े की तरह नशेड़ी फंस जाते हैं। वे इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि गुटका, तंबाकू में निकोटीन नाम का एक नशीला विष होता है। मानव शरीर के मस्तिष्क में जाकर यह तनाव पैदा करता है। तब ताकत बढऩे का भ्रम नशेडिय़ों को होता है, किंतु जब नाश उतरता है तो सुस्ती छा जाती है। मानव शरीर कैंसर,टीवी, दमा जैसी व्याधियों का घर बन जाता है। बीड़ी सिगरेट पीते समय कार्बन डाइऑक्साइड, निकोटिन युक्त धूवां शरीर के अंदर जाकर रसोई घर की दीवारों पर जमी धुएं की कालिक की तरह जम जाती है। बहुत से प्रबुद्ध? रचनाकार लेखन के वक्त सिगरेट बीड़ी का धकाधक सेवन करते हैं। जबकि यह कोरा वहम होता है, क्योंकि बार-बार सिगरेट बीड़ी को मुंह में लगाने निकालने, धुआं छोडऩे के काम से एकाग्रता टूटती है। चिकित्सकों का तो यह भी कहना है कि बीड़ी तंबाकू सिगरेट के सेवन से स्मरण शक्ति कमजोर होती चली जाती है। भलाई इसी में है कि हाए हाए की जिंदगी से छुटकारा पाने के लिए नशा को बाए बाए कहें। इस भ्रम को त्याग दें – लगे दम तो मिटे गम भुलावा है। नशा मजा का नहीं मौत का बुलावा है।