नीट पर्चा लीक मामला बहुत गंभीर था, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ। तमाम पर्चे लीक हुए, सैकड़ों युवाओं-छात्रों ने आत्महत्याएं की। दिल्ली में जो प्रदर्शन हुआ, वह बहुत गंभीर हो गया है। कहीं न कहीं ये युवाओं की दबी हुई भावनाओं का प्रदर्शन भी है, जिसने केवल सत्ता को ही नहीं, पूरे देश को हिला कर रख दिया है। इसके पहले निर्भया मामले में देश सडक़ पर आ गया था, पर कालांतर में यह बड़ा आंदोलन नहीं बन पाया। अब जंतर मंतर पर जिस तरह का युवाओं का विरोध प्रदर्शन देखा गया, वह बड़ी चिंगारी साबित न हो जाए। यहां युवाओं का सीधे सरकार से टकराव हुआ और फिर यह टकराव संसद तक चला गया है। संसद और सडक़ के बीच बढ़ता टकराव भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच गया है। भले ही इसे सत्ता में बैठे लोग महसूस न कर रहे हों, और यदि कर भी रहे हों तो इसे प्रकट नहीं कर रहे हैं, लेकिन मामला बहुत गंभीर हो गया है। और यदि ये कहा जाए कि जल्द समाधान नहीं किया गया तो कहीं पूरा देश इसकी चपेट में न आ जाए। जहां संसद कानून बनाने और जनसमस्याओं पर चर्चा का सर्वोच्च मंच है, वहीं सडक़ जन-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम है। जब दोनों स्थान संवाद के बजाय केवल टकराव, लाठीचार्ज और विरोध का पर्याय बन जाएं, तो यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। हाल ही में नीट परीक्षा में धांधली, पेपर लीक और लचर शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर देश के युवाओं और छात्रों का आक्रोश सडक़ों पर फूट पड़ा। संसद के भीतर भी इन मुद्दों पर विपक्ष के हंगामे के कारण बार-बार कार्यवाही स्थगित हुई। एक तरफ संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बहस का गतिरोध बना रहा, तो दूसरी ओर जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों और प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली की सडक़ों पर भारी पुलिस बल, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया गया। इन दो समानांतर दृश्यों के उभरने के पीछे कई गंभीर कारण और परिणाम हैं। लोकतंत्र की पहली शर्त संवाद है। जब सत्ताधारी पक्ष और जनता या उनके प्रतिनिधि के बीच संवाद की डोर कमजोर पड़ती है, तो विरोध प्रदर्शन सडक़ों पर उतर आते हैं। वहीं, युवाओं के भविष्य से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर त्वरित और ठोस समाधान निकालने के बजाय राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है। यह नौजवानों में भारी हताशा पैदा करता है। और शायद यही कारण है कि विशेष तौर पर शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह से गिरावट और धांधलियों के मामले आ रहे हैं, उसने भावी पीढ़ी को उद्वेलित कर दिया है। छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज उठाना और विरोध प्रदर्शन करना उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन सडक़ पर उन पर बल प्रयोग करना या उन्हें डराना लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। प्रधानमंत्री का कहना है कि किसी दोषी को बख्श नहीं रहे हैं और न बख्शा जाएगा, लेकिन आम आदमी की नजर में जो लोग जिम्मेदार लग रहे हैं, उन पर सही मायने में कोई कार्रवाई नहीं होती दिख रही है। यही कारण है कि बच्चों के विरोध प्रदर्शन में तमाम अभिभावक भी शामिल हो गए। जिन बच्चों ने आत्महत्या की, उनके परिजन भी सडक़ पर आ गए। यदि हम इसे सामान्य विरोध मानकर चल रहे हैं तो यह हमारी भूल साबित हो सकती है। हालांकि शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षाओं में पेपर लीक रोकने की मांग को लेकर छात्रों और विपक्ष के फैलते आंदोलन के बीच शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मोर्चे पर आगे आकर साफ संकेत दे दिया है कि वो कहीं नहीं जा रहे हैं। कॉकरोच जनता पार्टी की अपील पर आए छात्र-छात्राओं के बड़े संसद मार्च और प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस के प्रदर्शन के बाद प्रधान ने मंगलवार की रात से खुद मोर्चा संभाल लिया है। आंदोलन प्रधान का इस्तीफा मांग रहा है। लेकिन प्रधान का सामने आकर आंदोलन के सवालों और मसलों पर संसद के अंदर समग्र बहस का ऐलान करना संकेत है कि उन पर सरकार या पार्टी से इस्तीफा देने का कोई दबाव नहीं है। अलबत्ता प्रधान ने छात्रों के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगाकर यह जता दिया है कि वो इस मसले पर पलायन करने के बदले विपक्ष पर प्रहार करेंगे। सरकार ने संसद में गतिरोध खत्म करने के लिए केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह को भेजा, लेकिन बात बनी नहीं। जितेंद्र ने कहा कि राहुल पहले बहस के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन बाद में प्रधान के इस्तीफे की मांग करने लगे। राहुल गांधी सहित कांग्रेस सांसद और कुछ नेता पीएम आवास के बाहर धरने पर बैठ गए। उन्हें बलपूर्वक हटाया गया, तो कांग्रेस ने पूरे देश में शाम से ही विरोध करना शुरू कर दिया। बात नहीं बनती देख सरकार के अंदर विपक्ष और जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को लेकर नई रणनीति बनी, जिसके तहत देर रात 10.51 बजे धर्मेंद्र प्रधान को एक ट्वीट के साथ मैदान में उतार दिया गया। प्रधान ने ट्वीट में कहा था कि छात्रों की जवाबदेही सरकार की है और सरकार जवाब देने, सुधार करने और जवाबदेही लेने के लिए तैयार है। उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी पर लोकतांत्रिक बहस के बदले राजनीतिक तमाशा करने का भी आरोप लगाया। सरकार जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को भी खत्म कराने की कोशिश में जुट गई है, क्योंकि मार्च पर लाठीचार्ज के बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने पुलिस द्वारा तोड़ा गया मंच दोबारा खड़ा कर लिया है और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं के अलावा नौजवानों ने वहां लगातार डेरा-डंडा डाल रखा है। इसी मंच से सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अनशन कर रहे थे, जिन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल भेज दिया गया है। सरकार और वांगचुक के बीच बातचीत हुई है, लेकिन अभी कोई नतीजा सामने नहीं आया है। यह बात सरकार भी समझती है कि लोकतंत्र में समाधान टकराव या लाठी-डंडों से नहीं, बल्कि संसद के भीतर सार्थक बहसों और आम सहमति से निकाले जाने चाहिए। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे युवाओं की आवाज सुनें। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले सिस्टम को दुरुस्त कर ही इस भरोसे को फिर से बहाल किया जा सकता है। कहीं न कहीं इस आंदोलन को उग्र होने से बचाना होगा। यह जिम्मेदारी निश्चित तौर पर सरकार की ही होगी। हमारी नई पीढ़ी देश का भविष्य है, अगर युवा सडक़ पर रहेगा, आंदोलित रहेगा, तो देश का भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता।
इसका रास्ता तो निकलना ही चाहिए-संजय सक्सेना
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