अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, इजरायल की हठधर्मिता और ईरान की अपने प्रमुख की हत्या का बदला लेने की सनक ने वैश्विक शांति को तार-तार कर दिया है। अब वैश्विक शांति तथा शांति वार्ता की बातों को कोरी कल्पना ही मानकर चलिए। सभ्यता ने विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, किंतु विडंबना यह है कि इसी सभ्यता का नेतृत्व करने वाले अनेक विश्व नेता आज भी युद्ध, हथियारों की होड़ और शक्ति प्रदर्शन की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। आधुनिक विश्व का सबसे बड़ा संकट केवल आर्थिक असमानता या पर्यावरणीय विनाश नहीं, बल्कि वह मानसिक अस्थिरता और वैचारिक भ्रम है, जिसने वैश्विक नेतृत्व को असंवेदनहीन बना दिया है। शांति की भाषा आज उन्हें कमजोरों की भाषा प्रतीत होती है, जबकि इतिहास गवाह है कि स्थायी विकास केवल शांति और सहअस्तित्व से ही संभव हुआ है। आज दुनिया के कई शक्तिशाली राष्ट्र युद्ध की आग में झुलस रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व में इजऱाइल-फिलिस्तीन संघर्ष, चीन-ताइवान तनाव, उत्तर कोरिया की परमाणु धमकियाँ और आतंकवाद की बढ़ती घटनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि विश्व नेतृत्व संवाद के स्थान पर टकराव को प्राथमिकता दे रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानों मानवता की करुणा पर सत्ता की महत्वाकांक्षा भारी पड़ गई हो। महात्मा गांधी ने कहा था- आँख के बदले आँख पूरे विश्व को अंधा बना देगी। गांधीजी का यह कथन आज पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। विश्व के बड़े नेता प्रतिशोध और प्रभुत्व की राजनीति में इतने उलझ चुके हैं कि उन्हें युद्ध के पीछे रोती मानवता दिखाई नहीं देती। लाखों निर्दोष नागरिक विस्थापित हो रहे हैं, बच्चे अनाथ हो रहे हैं,अर्थव्यवस्थाएँ बिखर रही हैं, किंतु हथियार उद्योग और सामरिक राजनीति लगातार फल-फूल रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने कहा था हमें युद्ध को मानवता के भविष्य से बाहर करना होगा। दुर्भाग्य यह है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएँ भी आज महाशक्तियों के राजनीतिक दबाव से पूर्णत: स्वतंत्र नहीं रह पाई हैं। वीटो शक्ति रखने वाले देश अक्सर अपने हितों के अनुसार वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करते हैं। परिणामस्वरूप शांति वार्ताएँ केवल औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। विश्व के बड़े नेताओं की मानसिकता में एक गहरा भय भी दिखाई देता है-सत्ता खोने का भय, वर्चस्व समाप्त होने का भय और दूसरे राष्ट्र के अधिक शक्तिशाली हो जाने का भय। यही भय उन्हें शांति की जगह युद्ध की तैयारी की ओर धकेलता है। अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी ने अपने एक ऐतिहासिक भाषण में कहा था मानव जाति को युद्ध समाप्त करना होगा, अन्यथा युद्ध मानव जाति को समाप्त कर देगा। केनेडी की यह चेतावनी आज परमाणु हथियारों से लैस दुनिया के लिए किसी भविष्यवाणी से कम नहीं लगती। वर्तमान वैश्विक राजनीति में सबसे चिंताजनक बात यह है कि नेताओं की भाषा से संवेदनशीलता कम होती जा रही है। राजनीतिक मंचों पर संवाद के स्थान पर कटुता और धमकियों का प्रयोग बढ़ गया है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पंचशील सिद्धांत प्रस्तुत करते हुए कहा था कि विश्व शांति सहअस्तित्व और पारस्परिक सम्मान से ही संभव है। उन्होंने गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से यह संदेश दिया कि शक्ति संतुलन युद्ध से नहीं बल्कि संवाद से कायम रखा जा सकता है। किंतु आज विश्व राजनीति में संवाद की जगह आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य गठबंधन और हथियारों का प्रदर्शन अधिक दिखाई देता है। हथियार कंपनियों का बढ़ता प्रभाव भी विश्व शांति के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। युद्ध जितना लंबा चलता है, हथियार उद्योग उतना अधिक लाभ कमाता है। ऐसे में शांति प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं। भारत सदैव ‘वसुधैव कुटुंबकम्Ó की राह पर चलता है। भगवान बुद्ध ने अहिंसा और करुणा का संदेश दिया। स्वामी विवेकानंद ने विश्व बंधुत्व की बात की। फिर भी आधुनिक विश्व ने इन आदर्शों को केवल भाषणों तक सीमित कर दिया है। विश्व नेताओं को यह समझना होगा कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। युद्ध केवल विनाश की नई नींव रखता है। शांति कमजोरी नहीं बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। जो नेता संवाद, सहिष्णुता और मानवता की रक्षा करते हैं, इतिहास अंतत: उन्हीं को महान मानता है।
शांति की बात अब कोरी कल्पना!-संजीव ठाकुर
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