नागरिकता का मुद्दा….-संजय सक्सेना

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5 फरवरी 2025 को अमेरिका ने पहली बार सैन्य विमान से 104 भारतीयों को अमृतसर भेजा था। इस दौरान कई लोगों को हथकड़ी और पैरों में बेडिय़ां लगी थीं। इसकी तस्वीरें सामने आने के बाद देशभर में विवाद हुआ। संसद में भी हंगामा हुआ था। फिर से खबर आ रही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डिपोर्टेशन का बड़ा अभियान छेडऩे की तैयारी कर ली है। अमेरिका में 18 हजार बिना दस्तावेज वाले भारतीय निशाने पर आ गए हैं। इस बार भी ट्रम्प प्रशासन डिपोर्टेशन के लिए सैन्य विमानों के इस्तेमाल की तैयारी में है, जो उनकी सख्त इमिग्रेशन नीति की सबसे चर्चित तस्वीर बन चुका है। डिपोर्टेशन अभियान ने बिना दस्तावेज वाले भारतीयों की जिंदगी पूरी तरह बदल दी है। डिटेंशन सेंटर में बंद लोगों के साथ दुर्व्यवहार की कहानियां भी सामने आईं हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका भी नहीं मिलता। अब खबरें ये भी आ रही हैं कि आस्ट्रेलिया और कुछ अन्य देशों से भी भारतीयों को निकालने की तैयारी है। यही नहीं, दुनिया के कई व्यावसायिक शहरों में भारतीय निशाने पर आ रहे हैं। अन्य देशों में भारतीयों से दुव्र्यवहार की निंदा तो हम करते हैं, लेकिन भारत के अंदर भी अब सवाल उठने लगा है कि क्या हम भी उसी राह पर जा रहे हैं? हम दूसरे देशों से अपेक्षा करते हैं कि वे भारतीयों का स्वागत करें, उन्हें स्थायी आवास और अंतत: नागरिकता भी प्रदान करें। लेकिन हम शायद ही कभी सवाल उठाते हैं कि क्या भारत के अपने नागरिकता कानूनों में भी वैसा ही खुलापन है? अप्रवासियों के अधिकारों पर हमारी चिंता अक्सर हमारी ही सीमाओं पर आकर रुक जाती है। हम अचानक देश की सीमाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाने लगते हैं। आज भारत में नागरिकता का मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है। तमाम प्रमाणों को नागरिकता के लिए नकारा जा रहा है। संविधान के निर्माण के समय भारत भी स्वत: मिलने वाली जन्मसिद्ध नागरिकता प्रदान करता था। 1955 के मूल नागरिकता अधिनियम के तहत 26 जनवरी 1950 या उसके बाद भारत में पैदा हुआ कोई भी व्यक्ति जन्म से भारतीय नागरिक माना जाता था, भले ही उसके माता-पिता की राष्ट्रीयता कुछ भी हो। अमेरिका में भी ऐसा ही कानून बना था। 1986 के संशोधन के जरिए भारतीय संसद ने जन्मसिद्ध नागरिकता की व्यवस्था समाप्त कर दी। इसके अनुसार 1 जुलाई 1987 या उसके बाद भारत में जन्म लेने वाले व्यक्ति को नागरिकता तभी मिल सकती थी, जब उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय नागरिक हो। 2003 में इस कानून में फिर संशोधन हुआ और प्रावधान किया गया कि 3 दिसंबर 2004 या उसके बाद भारत में जन्म लेने वाले व्यक्तियों के माता-पिता में से कोई एक भले ही भारतीय नागरिक हो, लेकिन फिर भी उसे नागरिकता का स्वत: अधिकार नहीं मिलता। इसके लिए यह भी आवश्यक हो गया कि दूसरा अभिभावक अवैध प्रवासी न हो। यानी, भले आपके माता-पिता में से कोई एक भारतीय है और भले ही आपके दादा-परदादा तक भारत में ही जन्मे हों, तब भी आपको स्वत: नागरिकता नहीं मिल सकेगी। इन संशोधनों की पृष्ठभूमि में भारत में अवैध बांग्लादेशियों की मौजूदगी को लेकर चिंताएं बताई जाती रही हैं। लेकिन गौर करने वाली यह है कि भारत में अवैध बांग्लादेशियों की संख्या को लेकर लगाए गए सभी अनुमान अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे लोगों की तुलना में बहुत मामूली हैं। इसके अलावा भारत में नागरिकता प्राप्त करने की कानूनी प्रक्रिया भी कोई आसान नहीं है। सही बात तो यह है कि नागरिकता प्राप्त करने के लिए भारत दुनिया के कठोरतम शर्तें लागू करने वाले देशों में से एक है। सामान्यत: किसी विदेशी नागरिक को आवेदन के योग्य बनने से पहले सात वर्ष तक भारत में निवास करना पड़ता है और फिर भी नागरिकता देना पूरी तरह सरकार के विवेक पर ही निर्भर है। किसी भारतीय नागरिक से विवाह करने पर भी स्वत: नागरिकता नहीं मिलती। विदेश में जन्मे जीवनसाथी को भी नागरिक के रूप में पंजीकरण कराने से पहले लंबे समय तक निवास संबंधी शर्तों को पूरा करना पड़ता है। भारत में पीढिय़ों से रह रहे हजारों तिब्बती परिवार इस विसंगति का उदाहरण पेश करते हैं। उनमें से बहुत-से भारत में जन्मे, भारतीय स्कूलों में पढ़े, भारतीय भाषाएं बोलते हैं और भारत के अलावा किसी अन्य देश को अपना घर नहीं मानते। फिर भी कानून उन्हें स्वत: नागरिकता प्रदान नहीं करता। हम शैक्षणिक संस्थानों में तिब्बती शरणार्थियों और उनके वंशजों के लिए सीटें आरक्षित करते हैं, लेकिन यदि वे भारतीय नागरिक बनना चाहें तो उन्हें नौकरशाही की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। हालांकि हर देश को यह तय करने का अधिकार है कि कौन उसका नागरिक बनेगा। लेकिन हम भारतीय दूसरे देश में तो अपने अधिकार की बात करते हैं, लेकिन हमारे ही देश में हम स्वयं अपने आप को नागरिक आसानी से सिद्ध नहीं कर पा रहे हैं। आज जो चर्चाएं चल रही हैं, उनका लब्बोलुआव तो यही है। जिन प्रमाणों को आज तक नागरिकता की पहचान माना जाता रहा था, आज उन्हें हमारी ही सरकार नकार रही है। जो पीढिय़ों से देश में रह रहे हैं, सरकार कभी भी उन्हें देश की नागरिकता से बेदखल कर सकती है। हम बात तो विश्व बंधुत्व बात करते हैं, लेकिन हम स्वयं मानसिक रूप से बहुत संकुचित हो रहे हैं। अपने बच्चों के लिए तो पूरी दुनिया को घर मानने लगते हैं। वहां शिक्षा से लेकर करोड़ों के पैकेज पर अपना अधिकार मान लेते हैं, लेकिन हम अपने देश की नागरिकता को लेकर अपनी सोच का विस्तार कर पा रहे हैं? जो इस देश में ही पीढिय़ों से रह रहे हैं, क्या उन्हें लेकर उदारता की नहीं आवश्यकता है? शायद सोच का दायरा बढ़ाया जाए तो कुछ बेहतर हो सकता है।