आमरण अनशन हो या क्रमिक भूख हड़ताल, इस पर बैठने वालों की सुध लेनी ही चाहिए. उन्हें समझाना बुझाना चाहिए, उनकी मांगें पूरी हों, इसका प्रयास होना चाहिए. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि ज्यादातर मामलों में सरकार ऐसे लोगों की उपेक्षा करती है. लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति, विरोध और अपनी मांगों को सरकार तक पहुँचाने के कई शांतिपूर्ण रास्ते हैं, जिनमें ‘आमरण अनशनÓ और ‘क्रमिक भूख हड़तालÓ को सबसे गंभीर और संवेदनशील माना जाता है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह के समय से ही उपवास को केवल एक राजनीतिक हथियार नहीं, बल्कि नैतिक दबाव का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। जब कोई नागरिक अपने जीवन को दांव पर लगाकर किसी मुद्दे पर बैठता है, तो वह केवल अपनी व्यक्तिगत मांग नहीं रख रहा होता, बल्कि व्यवस्था के सामने एक गंभीर नैतिक सवाल खड़ा कर रहा होता है। ऐसे में किसी भी कल्याणकारी और संवेदनशील सरकार का यह प्राथमिक कर्तव्य बनता है कि वह ऐसे आंदोलनों के प्रति संवेदनशीलता दिखाए, आंदोलनकारियों की सुध ले और संवाद के माध्यम से बीच का रास्ता निकालने का प्रयास करे। दुर्भाग्यवश, भारतीय राजनीति के हालिया इतिहास में यह देखा गया है कि सरकारों का रुख अक्सर ऐसे अनशनकारियों के प्रति उपेक्षा और संवेदनहीनता का रहा है। इतिहास गवाह है कि पर्यावरणविद और वैज्ञानिक प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद), जिन्होंने गंगा नदी की अविरलता और शुद्धता के लिए 112 दिनों तक लंबा आमरण अनशन किया, आखिरकार प्रशासन की कथित अनदेखी के कारण हमारे बीच नहीं रहे। उनके पहले भी स्वामी निगमानंद जैसे संतों ने गंगा रक्षा के लिए प्राण त्यागे। जब व्यवस्था इतनी लंबी तपस्या और जीवन के संकट को भी नजरअंदाज कर देती है, तो यह लोकतांत्रिक ताने-बाने पर एक गहरा आघात होता है। संवाद की कमी नागरिक और सरकार के बीच की खाई को और चौड़ा कर देती है। वर्तमान में लद्दाख के मुद्दों को लेकर चर्चा में रहने वाले प्रसिद्ध पर्यावरणविद और सुधारक सोनम वांगचुक भी अपने अधिकारों और विभिन्न मांगों को लेकर अनशन जैसे रास्तों का सहारा लेते रहे हैं। वर्तमान संदर्भ में, भले ही उनके द्वारा ‘नीटÓ परीक्षा से जुड़ी गड़बडिय़ों को लेकर केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे की मांग की जा रही हो, जिसे कई विश्लेषक परीक्षा के दोबारा निष्पक्ष रूप से संपन्न होने के बाद समय के अनुकूल नहीं या अप्रासंगिक मान रहे हों, लेकिन सरकार का दायित्व यहाँ समाप्त नहीं होता। लोकतंत्र में मांगों के सही या गलत होने का निर्णय केवल एकतरफा नहीं हो सकता। यदि कोई प्रतिष्ठित नागरिक देश के युवाओं और शिक्षा व्यवस्था की शुचिता के लिए चिंतित होकर बैठता है, तो सरकार के प्रतिनिधियों को स्वयं आगे बढ़कर उनसे बात करनी चाहिए। प्रशासन को वांगचुक जी जैसे व्यक्तित्वों के पास जाकर उन्हें यह आश्वस्त करना चाहिए कि भविष्य में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में किसी भी प्रकार की तकनीकी या प्रशासनिक लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। युवाओं का भविष्य सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं। जब सरकार यह भरोसा दिलाएगी, तो निश्चित रूप से आंदोलनकारियों का व्यवस्था में विश्वास बहाल होगा। इसके साथ ही, आंदोलनरत नागरिकों को भी यह समझना होगा कि लोकतंत्र में जिद से ज्यादा संवाद का महत्व है। अगर किसी समस्या का व्यावहारिक समाधान निकल चुका है, तो आंदोलन को तार्किक मोड़ पर समाप्त करना ही राष्ट्रहित में होता है। अंतत:, किसी भी चुनी हुई सरकार को आमरण अनशन को एक चुनौती या कानून-व्यवस्था की समस्या के रूप में देखने के बजाय, एक जागरूक नागरिक की पुकार के रूप में देखना चाहिए। किसी भी अनशनकारी की जान जाना अंतत: पूरे समाज और शासन तंत्र की सामूहिक विफलता है। संवाद के बंद दरवाजे खोलकर, संवेदनशीलता दिखाकर और नागरिक के जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देकर ही हम एक स्वस्थ और मजबूत लोकतंत्र की स्थापना कर सकते हैं।
आमरण अनशन–गिरीश पंकज
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