बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में मीडियाकर्मी कैलाश यादव के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को निरस्त कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण के जांच और चार्जशीट दाखिल करने में छह साल से अधिक की देरी आरोपी को प्रताड़ित करने के समान है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता कैलाश यादव, जो बिलासपुर के सिरगिट्टी निवासी और एक निजी चैनल में वीडियो जर्नलिस्ट हैं, के खिलाफ वर्ष 2018 में पुलिस ने शासकीय कार्य में बाधा, मारपीट और अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। मामला उस समय का है जब पुलिसकर्मियों के आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नी को महिला थाने में बैठाए जाने की सूचना पर वे अपनी टीम के साथ कवरेज के लिए पहुंचे थे। आरोप है कि जानकारी मांगने पर पुलिस ने सहयोग करने के बजाय उनके साथ दुर्व्यवहार किया और बाद में उनके खिलाफ मामला दर्ज कर दिया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि घटना वर्ष 2018 की थी, जबकि पुलिस ने नवंबर 2024 में चार्जशीट पेश की। इस छह साल की देरी का पुलिस कोई संतोषजनक कारण नहीं बता सकी। अदालत ने यह भी कहा कि पूरा मामला केवल पुलिसकर्मियों और उनसे जुड़े गवाहों के बयानों पर आधारित था। घटनास्थल पर कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था और गवाहों के बयानों में भी विरोधाभास था।
हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी अपराध का कोई ठोस और प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है। ऐसे में मामले को आगे बढ़ाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर अदालत ने एफआईआर और चार्जशीट दोनों को निरस्त करते हुए मीडियाकर्मी को राहत प्रदान की।
