जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने पिछले दिनों केंद्र सरकार से यह मांग करके सबको चौंका दिया कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए. हालांकि अनेक हिंदू संगठन शुरू से ही अब मांग करते रहे हैं,क्योंकि गाय उनके लिए आस्था की चीज है. गाय को वह पशु में नहीं मानते, गाय को माता कहते हैं. मदनी की मांग का कितना असर होगा, यह तो कहा नहीं जा सकता लेकिन जायज मांग है. मदनी का कहना है कि अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाएगा तो गौ हत्या रुकेगी. गौ तस्करी पर विराम लगेगा. और गाय के नाम पर जो हिंसा होती है, वह भी काफी हद तक रुक जाएगी. अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर दिया जाए तो मुस्लिम समाज को कोई आपत्ति नहीं होगी. हालांकि अपने देश में शेर को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जा चुका है. ऐसी स्थिति में गाय को भी राष्ट्रीय पशु घोषित करना एक चुनौती से कम नहीं है.फिर भी सरकार को इस मसले पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए. मदनी ने तीखे तेवर के साथ केंद्र सरकार से यह सवाल किया कि अगर बहु संख्यक समाज गाय को पवित्र मानता है और माता का दर्जा देता है तो ऐसी क्या राजनीतिक मजबूरी है कि सरकार उसे राष्ट्रीय पशु घोषित करने से बच रही है? मदनी ने कहा कि यह मांग केवल हम नहीं उठा रहे, यह तो वर्षों से साधु संत भी उठाते रहे हैं. लेकिन सरकार इस मामले में गंभीर नजर नहीं आती. मदनी ने इस बात की चिंता व्यक्त की कि गौकशी के नाम पर इस देश में अफवाहें भी फैलाई जाती हैं, और समाज का एक बड़ा वर्ग मुसलमान को गौविरोधी समझने लगा है. इसलिए समय-समय पर उनकी मॉब लिंचिंग भी हो जाती है. जबकि यह सत्य नहीं है. अनेक मुसलमान भी गोपालन करते हैं,दूध का व्यवसाय करते हैं. मदनी ने 2014 में मुंबई में हुए साधु संतों के सम्मेलन में भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई थी. उन्होंने मुसलमान से भी अनुरोध किया है कि प्रतिबंधित पशुओं की कुर्बानी से बचें. अब तो पश्चिम बंगाल के हाईकोर्ट ने भी दो टूक कहा है कि गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है. हाई कोर्ट ने गोवंश वध संबंधी पाबंदी के विरुद्ध दायर याचिकाओं को रद्द कर दिया है. मदनी की इस बात में दम है कि कुछ लोगों का गाय से वास्तविक श्रद्धा नहीं है बल्कि राजनीति से प्रेम है. इस बीच यह खबर भी हैरान करने वाली है कि पश्चिम बंगाल में बकरीद के अवसर पर गाय काटने पर प्रतिबंध लगाने के बाद सुबह हिंदू बड़े परेशान हैं, जो मुसलमान को गाय बेचा करते थे.इस मामले को बढ़ा-चढ़ा कर भी पेश किया जा रहा है, और यह बताने की कोशिश की जा रही है कि अगर मुसलमान गाय काटते हैं, तो उसको बेचने वाले हिंदू भी हैं.खबर यह आ रही है कि इस बार मुसलमान ने संकल्प किया है कि वह गायों की कुर्बानी नहीं देंगे.इस कारण अपनी बीमार गायों को बेचने वाले हिंदू परेशान हैं.अगर इस बात में सच्चाई है तो यह दुर्भाग्यजनक है. हालांकि मैंने अपने उपन्यास ‘एक गाय की आत्मकथाÓ में व्यंग्यात्मक तरीके से एक जगह का उल्लेख किया है कि जब गाय बूढी हो जाती है, तब हिंदू उसे कसाई को भेज देते हैं.और यह कटु सत्य भी है. इसे स्वीकार करना होगा. हिंदू समाज को आत्म-मंथन करना होगा कि मुसलमान के पास पहुंचने वाली गायें वहां तक पहुंचाता कौन है? बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि मदनी की मांग पर केंद्र सरकार विचार करेगी और गाय को और राष्ट्रीय पशु घोषित कर देगी.
गाय बने राष्ट्रीय पशु! : गिरीश पंकज
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