हैदराबाद। आमतौर पर फेफड़ों के कैंसर (लंग कैंसर) का सीधा संबंध धूम्रपान या तंबाकू के सेवन से जोड़ा जाता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक ऐसा खतरनाक और नया ट्रेंड देखा है जिसने सबकी चिंता बढ़ा दी है। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश सहित पूरे दक्षिण भारतीय राज्यों में लंग कैंसर के ऐसे कई नए मरीज सामने आ रहे हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी तंबाकू या सिगरेट को हाथ तक नहीं लगाया। सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि इन बिना स्मोकिंग करने वाले मरीजों में सबसे बड़ी संख्या महिलाओं की है।
आईसीएमआर-एनसीडीआईआर (ICMR-NCDIR) की ‘तेलंगाना कैंसर बर्डन प्रोफाइल’ के मुताबिक, राज्य में हर साल 46,700 से अधिक कैंसर के नए मामले दर्ज हो रहे हैं, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत बड़ी है। अकेले हैदराबाद में लंग कैंसर के लिए हर 1,00,000 महिलाओं में 6.8 की दर (ASIR) रिकॉर्ड की गई है, जो भारत के बड़े मेट्रो शहरों में महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा है। डॉक्टरों का कहना है कि दक्षिण भारत में महिलाओं में तंबाकू का चलन 10 प्रतिशत से भी कम है, इसके बावजूद डेटा दिखाता है कि यहाँ महिलाओं में होने वाले 70.3 प्रतिशत कैंसर पूरी तरह से गैर-तंबाकू कारणों से हो रहे हैं, जिनमें लंग कैंसर तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
हैदराबाद के बसवतारकम इंडो-अमेरिकन कैंसर हॉस्पिटल की एक हालिया जीनोमिक स्टडी में पता चला है कि दोनों तेलुगु राज्यों (तेलंगाना और आंध्र प्रदेश) की आबादी में एक खास जेनेटिक संवेदनशीलता पाई गई है। स्थानीय लोगों के जीन में ऐसे बदलाव देखे गए हैं, जो शरीर की पर्यावरण प्रदूषण और घरेलू बायोमास (चूल्हे आदि) के धुएं को साफ करने की प्राकृतिक क्षमता को कम कर देते हैं। इसके अलावा, मेट्रो शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, गाड़ियों से निकलने वाले धुएं, कंस्ट्रक्शन की धूल और औद्योगिक प्रदूषण (PM 2.5) के कारण नॉन-स्मोकर्स के फेफड़ों में भी भारी काला कार्बन जमा हो रहा है। यही सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई में जाकर सेलुलर म्यूटेशन (DNA डैमेज) को जन्म दे रहे हैं, जिससे स्मोकिंग न करने वाली महिलाओं में ‘एडेनोकार्सिनोमा’ (फेफड़ों के बाहरी हिस्से का कैंसर) का खतरा तेजी से बढ़ गया है।
