अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ‘वोटिंग राइट्स एक्ट’ को लगा झटका; ओबामा और हैरिस ने जताया कड़ा विरोध

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वॉशिंगटन। अमेरिका में चुनावी कानून को लेकर एक बड़ा और विवादास्पद फैसला सामने आया है, जहां अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लुइसियाना बनाम कैलाइस मामले में 6-3 के बहुमत से ऐसा निर्णय दिया, जिसने वोटिंग राइट्स एक्ट की धारा 2 के प्रभाव को काफी हद तक सीमित कर दिया है। वहीं इस फैसले के बाद अब किसी भी चुनावी नक्शे को नस्लीय आधार पर चुनौती देना पहले से कहीं ज्यादा कठिन हो जाएगा। कोर्ट के इस निर्णय ने अमेरिका की राजनीति और नागरिक अधिकारों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। दरअसल इस फैसले को जस्टिस सैमुअल अलिटो ने लिखा। उन्होंने कहा कि अदालत को यह मानकर चलना चाहिए कि राज्य सरकारें सद्भावना में काम कर रही हैं। कोर्ट ने नस्लीय गेरिमैंडरिंग और राजनीतिक गेरिमैंडरिंग के बीच फर्क को और स्पष्ट किया। 2019 के एक फैसले के अनुसार, राजनीतिक आधार पर बनाए गए नक्शों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। अब नए फैसले के बाद, अगर कोई यह साबित करना चाहता है कि नक्शा नस्लीय भेदभाव के लिए बनाया गया है, तो उसे और अधिक ठोस सबूत पेश करने होंगे।

आपको बता दें की पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और पूर्व उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले की कड़ी आलोचना की है, जो मतदान अधिकारों से जुड़ा है। ओबामा ने कहा कि यह फैसला वोटिंग राइट्स एक्ट के एक अहम हिस्से को कमजोर करता है। उनके अनुसार इससे राज्यों को यह मौका मिल सकता है कि वे चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं ऐसे तरीके से बदलें, जिससे काले और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का वोटिंग असर कम हो जाए। उन्होंने कहा कि अगर राज्य इसे राजनीतिक वजह बताकर करें, तो इसे रोकना मुश्किल होगा। ओबामा ने इसे लोकतंत्र के लिए एक झटका बताया, लेकिन लोगों से अपील की कि वे हर चुनाव में ज्यादा से ज्यादा वोट करें और सक्रिय रहें। कमला हैरिस ने इस फैसले को सत्ता हथियाने की कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि कानून की धारा-2 के तहत ब्लैक और ब्राउन वोटर्स को संघीय सुरक्षा मिलती थी। अब भेदभाव रोकने वाला यह प्रावधान कमजोर होगा। उनके अनुसार कुछ राज्य, खासकर दक्षिणी अमेरिका में, जल्द ही चुनावी नक्शे बदल सकते हैं ताकि अपने राजनीतिक फायदे के लिए सीटों को सुरक्षित किया जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि इससे आम लोगों की समस्याएं जैसे महंगाई, गैस, घर और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों से ध्यान हट जाता है।

हैरिस ने लोगों से अपील की कि वे इस स्थिति पर ध्यान दें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रहें। दोनों नेताओं ने कहा कि अब लड़ाई राज्यों और जनता के स्तर पर है, और इसका जवाब मतदान के जरिए दिया जा सकता है। हैरिस ने चेतावनी दी कि अब कई राज्य, खासकर दक्षिणी राज्य, 2026 के मध्यावधि चुनाव और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले अपने चुनावी नक्शे बदल सकते हैं। वहीं कोर्ट के इस फैसले पर जस्टिस एलेना कगन ने कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि यह निर्णय पुनर्निर्माण युग के बाद अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व में सबसे बड़ी गिरावट की नींव रख सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब नागरिक अधिकार संगठनों के लिए अदालत में केस जीतना लगभग मिशन इम्पॉसिबल हो जाएगा, क्योंकि उन्हें ऐसे वैकल्पिक नक्शे भी पेश करने होंगे जो राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करें, लेकिन नस्ल का उपयोग न करें। इस फैसले का असर तुरंत दिख सकता है। लुइसियाना और फ्लोरिडा जैसे राज्य पहले ही अपने चुनावी नक्शों में बदलाव की तैयारी कर रहे हैं। अब जब संघीय सुरक्षा कमजोर हो गई है, तो चुनावी लड़ाई राज्यों के स्तर पर ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगी। राज्य सुप्रीम कोर्ट और स्थानीय चुनावों की भूमिका और भी बढ़ जाएगी।