एक कृति की हीरक जयंती – गिरीश पंकज

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‘रश्मिरथी’ राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी का खंडकाव्य ही नहीं है,वह मानव-सभ्यता किस तरह की हो, इसको गढ़ी जाने वाली एक आचार संहिता भी है. जहां वीरता भी है, शौर्य भी है,लेकिन उसकी अंतर्धारा में समतामूलक मानवीय मूल्य भी हैं. कवि दिनकर मनुष्यता के पक्षधर हैं.  सन 1952 में यह कृति प्रकाशित हुई थी. आज 2026 है.यानी यह वर्ष इस खंड काव्य के हीरक जयंती का वर्ष है. सिर्फ भारतीयता नहीं वरन वैश्विक मनुष्यता के पक्ष में दिनकर का रचनात्मकता अवदान रहा है. इसलिए तो रश्मिरथी के प्रथम सर्ग के प्रथम भाग में वह लिखते हैं-

‘जय हो जग में जेल जहां भी, नमन पुनीत अनल को,
जिस नर में भी बसे हमारा नमन तेज को, बल को.
किस वृंत पर खिले विपिन में, पर नमस्य है फूल.
सुधी खोजने नहीं, गुणों को आदि शक्ति का मूल.

दिनकर ‘रश्मिरथीÓ में जो चिंतन व्यक्त करते हैं, वह चिंतन श्रेष्ठ मनुष्य की संरचना का सहायक बन सकता है. एक बेहतर मनुष्य आखिर कैसा होना चाहिए, उसकी सुंदरतम परिभाषा देते हुए दिनकर कहते हैं कि श्रेष्ठ मनुष्य या श्रेष्ठ ज्ञानी वह है जो किसी से किसी तरह का भेदभाव नहीं करता.जिसके भीतर करुणा है, दया है,ममता है,दरअसल वही संसार का पूज्य प्राणी हो सकता है. और जहां तक क्षत्रिय होने की बात है तो वह कहते हैं क्षत्रिय वही है, जिसके भीतर निडरता हो, साहस हो, हिम्मत हो. श्रेष्ठ ब्राह्मण की परिभाषा बताते हुए भी वह कहते हैं, एक अच्छे ब्राह्मण में तप और त्याग की भावना होती है. वह उदार होकर सबसे स्नेह करता है. दिनकर गोत्र से ज्यादा महत्व व्यक्ति के तेज को देते हैं. जिसमें चरित्र होता है, तेज होता है, वे लोग यशस्वी होते हैं. दुनिया में उनका नाम होता है. लेकिन जो हीनभावना से ग्रस्त होते हैं, वह जहां के तहाँ रह जाते हैं. वह इतिहास नहीं बनाते. इतिहास तो वही बनाते हैं जो सही मायने में ज्ञानी और तेजस्वी होते हैं. कविता देखें,

‘ऊँच- नीच का भेद नहीं माने, वही श्रेष्ठ ज्ञानी है.
दया-धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है.
क्षत्रिय वही, भरी हो जिसमें निर्भरता की आग,
सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण है, हो जिसमें तप-त्याग.

‘रश्मिरथी को पढ़ते हुए या कहें कि उससे संवाद करते हुए हमारे सामने एक ऐसे महान व्यक्तित्व का चित्र उभरता है, जिसने तमाम संघर्षों के बीच अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई. जो सूर्यपुत्र था लेकिन उपेक्षित था. लेकिन अंतत: उसे इतिहास में वह प्रतिष्ठा मिली, जिसके वह सर्वथा योग्य था. अपनी उपेक्षा के कारण वह विद्रोही जरूर हुआ लेकिन उसके भीतर दानशीलता थी,पौरुष था. लेकिन ऐसा पुरुष जो स्वाभिमान से भरा हो. जिसने जाति धर्म को कोई महत्व नहीं दिया. जिसने अपने बलबूते अपने व्यक्तित्व को गढ़ा.शस्त्र और शास्त्र दोनों का जिसने अध्ययन किया.उसमें निपुण हुआ.सचमुच वह कर्ण था, जिसके व्यक्तित्व को दुर्योधन ने पहचाना.  समाज जीवन में अगर एक महानायक के रूप में जिसे प्रतिष्ठा मिली, तो कहा जा सकता है कि दिनकर जी के खण्डकाव्य ‘रश्मिरथीÓ के माध्यम से ही मिली. पौराणिक काल में अनेक पात्र हुए, लेकिन कर्ण की जिस तरह से आधुनिक संदर्भ में व्याख्या और कथानक दिनकर जी ने प्रस्तुत किया,वह अप्रतिम है. कर्ण तो ऐसे व्यक्तित्व का प्रतीक बन करके भी उभरता है, जिसे हम समाज में उपेक्षित जन कह सकते हैं. जो प्रतिभाशाली तो होते हैं, लेकिन कहीं छुपे रहते हैं. रश्मिरथी वीरता का आख्यान है. जातिवाद के विरुद्ध एक हस्तक्षेप है, लेकिन वह दान के महत्व को भी प्रतिपादित करने वाली कृति है. कर्ण को हम महान वीर के साथ साथ महादानी के रूप में भी याद करते हैं.दिनकर जी ने रश्मिरथी के अंत में कर्ण के दानवीर स्वरूप को प्रस्तुत हुए भारतीय समाज से यही आग्रह किया है कि हमारे भीतर भी वह दानवीरता बनी रहे,जो कर्ण के जीवन में थी. सब कुछ जानते समझते हुए भी वह आसानी से अपना सर्वस्व दान करने पर आमादा थे. दिनकर जी कहते हैं –

‘दानवीर! जय हो, महिमा का गान सभी जन गाएँ,
देव और नर दोनों ही तेरा चरित्र अपनाएँ.
दे अमोघ शर-दान सिधारे, देवराज अंबर को,
व्रत का अंतिम मूल्य चुका कर, गया कर्ण निज घर को.

साहित्य की अनमोल धरोहर के रूप में सात दशक पहले लिखी गई यह कृति आज भी अगर चर्चा के केंद्र में है तो इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि यह खण्ड काव्य बुद्धि विलास नहीं करता वरन यह दीपशिखा की तरह ज्योतिर्मान है.  सूर्य की रश्मियों की तरह ज्ञान की रश्मियाँ बिखरने वाली इस कृति का रचनाकार यानी दिनकर ही मुझे सूर्य की रश्मियों रथ पर सवार दिखाई देते हैं. इसलिए उन्हें रश्मिरथी आगे बढ़कर सूर्यरथ पर सवार महाकवि कहूँगा.