दिल्ली में बढ़ सकते हैं बिजली बिल, आम जनता पर पड़ेगा खर्च का दबाव

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नई दिल्ली।  दिल्ली के बिजली उपभोक्ताओं के लिए आने वाला समय आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के बकाया 30,000 करोड़ की वसूली को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। दरअसल, अपीलेट ट्रिब्यूनल (APTEL) ने दिल्ली बिजली नियामक आयोग (DERC) की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें पुराने बकाये को चुकाने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की गई थी। यह पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के उस कड़े आदेश से जुड़ा है, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि सभी राज्यों को अपना पुराना बकाया अप्रैल 2028 तक हर हाल में चुकाना होगा। अब ट्रिब्यूनल के इस ताजा फैसले के बाद दिल्ली सरकार और DERC पर भुगतान का दबाव चरम पर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि, इस भारी-भरकम राशि की भरपाई का सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा। बिजली कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए तय शेड्यूल के अनुसार वसूली शुरू करनी होगी, जिसका एकमात्र व्यावहारिक रास्ता बिजली दरों (टैरिफ) में बढ़ोतरी नजर आ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में बिजली दरें काफी हद तक स्थिर रहीं और सब्सिडी के कारण उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिली, लेकिन इसी वजह से वितरण कंपनियों का राजस्व घाटा बढ़ता चला गया। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत इस घाटे को पाटने के लिए दरों में संशोधन अनिवार्य हो सकता है।

अब इस संकट से निपटने के लिए दो ही रास्ते शेष हैं, या तो दिल्ली सरकार अपनी सब्सिडी का बजट बढ़ाकर इस बोझ को खुद उठाए, या फिर उपभोक्ताओं के मासिक बिलों में सीधे तौर पर इजाफा किया जाए। जानकारों का कहना है कि, सरकार बीच का रास्ता चुन सकती है, जिसमें कुछ भार सब्सिडी के जरिए कम किया जाएगा और बाकी की वसूली टैरिफ बढ़ाकर की जाएगी। हालांकि, जब तक कोई ठोस फंडिंग मॉडल तैयार नहीं होता, तब तक घरेलू और व्यावसायिक दोनों ही श्रेणियों के उपभोक्ताओं पर महंगे बिजली बिलों की तलवार लटकती रहेगी। ट्रिब्यूनल के इस रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि, अब भुगतान में और देरी की गुंजाइश नहीं है।