राष्ट्रध्वज का सम्मान – गिरीश पंकज

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बात भले छोटी-सी हो लेकिन उससे व्यक्ति के व्यक्तित्व का, सोच का पता चल जाता है. पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने जो कुछ किया, उससे उनकी प्रतिष्ठा पर चार चांद लग गए. लोगों ने भी उनकी सराहना की और कहा कि उन्होंने बहुत सही किया. यही राष्ट्रभक्ति है. तिरंगे झंडे का भी सम्मान है. हुआ यह कि 15 अप्रैल को श्रीनगर में मुख्यमंत्री को कश्मीर हाट नामक एक प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया था. अक्सर यही होता है कि उद्घाटन के पहले लाल फीता लगा दिया जाता है, जिसे काटना होता है. यहां भी ऐसा हुआ, लेकिन लाल फीता की जगह उमर अब्दुल्ला ने वहां तिरंगा फीता देखा. रंग भी राष्ट्रीय ध्वज के रंगों जैसा था. केसरिया, सफेद और हरा. यह देखकर उमर अब्दुल्ला ठिठक गए. उन्होंने आयोजक को फटकारा और कहा कि इसे मैं नहीं काट सकता. इसे हटाओ. फिर उन्होंने उस फीते को निकाला और बड़े ही अदब के साथ लपेटकर किसी और के हवाले कर दिया. मुख्यमंत्री के इस व्यवहार को देखकर सभी चकित थे. तिरंगे का फीता लगाने वाले मूर्ख या कहें कि अति उत्साही अधिकारी को अपनी गलती का शायद एहसास हुआ हो. उसने ऐसा क्यों किया, क्या उसने नादानी में किया या जानबूझकर? यह जाँच का विषय होना चाहिए. बहुतों की यह मानसिकता तो रहती है कि कैसे तिरंगे का अपमान किया जाए. लेकिन भला हो उमर अब्दुल्ला जी का, जिन्होंने बुद्धिमानी दिखाई और तिरंगे रिबन को ससम्मान हटा दिया. मुझे पता चला है कि इसके पहले भी उमर अब्दुल्ला राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान का सम्मान करते रहे हैं. उमर अब्दुल्ला ने जो दृष्टांत प्रस्तुत किया है, उसे हर नेता या देश का हर नागरिक याद रखे. कई बार जाने-अनजाने में हम अति उत्साह में ऐसी हरकत कर बैठे हैं, जिससे राष्ट्रध्वज का अपमान ही होता है. किसी एक रंग का फीता होता तो कोई दिक्कत नहीं थी. चाहे वह हरा होता, केसरिया होता, लाल होता या सफेद होता चल जाता, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज के तीन रंगों से बना रिबन नहीं चल सकता. उसे काटना मतलब अपने ही राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करना है. इस घटना से दूसरे नेता भी सबक लें कि जब कभी मौका आए, राष्ट्रध्वज का, राष्ट्रगान का सम्मान करें. कई बार ऐसी घटनाएं देखने सुनने में आती हैं, जब राष्ट्रगान के समय कुछ नेता हिलते डुलते रहते हैं, बतियाते रहते हैं. मुझे लगता है कि राजनीति में आने वाले हर नेता को पहले उसके दल वाले एक कार्यशाला लेकर राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान के सम्मान का प्रशिक्षण दें ताकि समय-समय पर वे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान कर सकें.मुझे अपने साथ जुड़ी एक पुरानी घटना याद आती है, जो छत्तीसगढ़ के ही एक बड़े नेता से जुड़ी है. वे एक स्कूल के कार्यक्रम में पधारे थे. जहां मुझे भी उपस्थित होना था. तभी बाहर राष्ट्रगान बजने पर मैं बाहर निकाला और सावधान खड़ा हो गया. मगर नेताजी खड़े ही नहीं हुए. राष्ट्रगान खत्म हुआ तो मैं कमरे के भीतर दाखिल हुआ, तो नेता महोदय ने संकोच पूछा, ‘आप कहाँ चले गए थे?Ó मैंने कड़क स्वर में कहा, ‘राष्ट्रगान का सम्मान करने!Ó वह कुछ नहीं बोले और स्वल्पाहर करते रहे. बहुतों के मन में यह भाव क्यों नहीं जाग पाता कि हमें राष्ट्रगान का सम्मान करना है. अपने राष्ट्रध्वज को आदर देना है.शायद उन्होंने यह गीत कभी सुना ही न हो, ‘झंडा ऊंचा रहे हमाराÓ. हमको तो वह दृश्य याद करके भावुक हो जाना चाहिए, जब भारत का ही रहने वाला एक खिलाड़ी किसी दूसरे देश की टीम से खेल रहा होता है, और जब भारत का राष्ट्रगान सुनता है तो सावधान खड़े होकर अश्रु बहाने लगता है.