यात्रा के रूप एवं रंग- डॉ. माणिक विश्वकर्मा

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यात्रा जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे मानसिक शांति मिलती है एवं तनाव कम होता है। नये अनुभव एवं व्यक्तिगत विकास के साथ विभिन्न लोगों से मिलने तथा उनके रहन-सहन और संस्कृति को समझने का मौका मिलता है। नये वातावरण में जाने एवं प्राकृतिक सौंदर्य से रूबरू होने से मन प्रफुल्लित एवं तरोताजा हो जाता है। किसी भी यात्रा से प्राप्त अनुभव के अंतर्गत खुशी, थकान एवं कठिनाइयाँ शामिल होती हैं। जिन्हें कुछ समय बीत जाने के बाद जीवन में आए बदलाव को रेखांकित करते हुए आत्मविश्लेषण के साथ कलात्मक और साहित्यिक प्रस्तुति द्वारा संस्मरण का रूप दिया जाता है। यात्रा कहानी या वृतांत के अंतर्गत भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थितियों से अन्य लोगों को अवगत कराने के उद्देश्य से यात्रा संसाधन, स्थान विशेष का उल्लेख, वहां की संस्कृति एवं जनजीवन के महत्व का जीवंत क्रमिक तथ्यात्मक वर्णन शामिल किया जाता है। यात्रा निबंध यात्रा के लाभ, वहाँ के पर्यावरण एवं पर्यटन का सांस्कृतिक प्रभाव जैसे विषयों के बौद्धिक और वैचारिक पक्ष पर आधारित होता है। इसमें तथ्यों, तर्कों और सामान्य सिद्धांतों पर अधिक जोर दिया जाता है। यात्रा के अनुभवों को व्यक्त करने के लिए चित्रात्मक भाषा अर्थात ऐसी भाषा का प्रयोग किया जाता है जिससे पाठकों या श्रोताओं के मन में किसी दृश्य, वस्तु या स्थिति का एक सजीव और स्पष्ट मानसिक चित्र बन जाए और देखने की जिज्ञासा जागृत हो। उदाहरण के तौर पर जैनेंद्र कुमार की प्रसिद्ध कहानी ‘छह यात्रा’ का उल्लेख किया जा सकता है जिसमें केवल भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि मनुष्य की अंतरात्मा, प्रेम, कर्तव्य और आत्म-खोज की भावनात्मक यात्रा का चित्रण भी शामिल है। हिंदी के श्रेष्ठ यात्रा संस्मरणों में काका कालेलकर: ‘यात्रा का आनंद’, मोहन राकेश ‘आँखिरी चट्टान तक’, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’- ‘अरे यायावर रहेगा याद’, फणीश्वरनाथ रेणु- ‘ऋणजल धनजल’, निर्मल वर्मा: ‘चीड़ों पर चांदनी’, कृष्णा सोबती-‘बुद्ध का कमंडल लद्दाख एवं अमृतलाल वेगड़ के यात्रा संस्मरण- ‘तीरे-तीरे नर्मदा’ का उल्लेख किया जा सकता है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन हिंदी साहित्य में घुमक्कड़- शास्त्र के प्रणेता माने जाते हैं। वे जीवन-भर भ्रमणशील रहे ज्ञान के अर्जन में उन्होंने विभिन्न यात्राएँ करके किताबें लिखीं। 1948 में उनके द्वारा लिखित ‘किन्नर देश में’ हिमाचल प्रदेश की तिब्बत सीमा पर सतलुज नदी की उपत्यका में बसे किन्नौर की यात्रा- कथा है जिसमें उन्होंने क्षेत्र के इतिहास, भूगोल, वनस्पति, लोक-संस्कृति आदि अनेक पहलुओं की जानकारी सहित किन्नौर के अतीत, लोक- काव्य और उसका हिंदी अनुवाद, किन्नर भाषा का व्याकरण और शब्दावली को भी रेखांकित किया है। उद्देश्य और रुचि के आधार पर यात्राओं को कई रूपों एवं प्रकारों में बाँटा जा सकता है यथा धार्मिक एवं तीर्थ, रोमांच, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, पर्यटन, व्यापारिक, सोलो, स्वास्थ्य और चिकित्सा, वित्तीय, शिक्षा, सामाजिक, राजनीतिक, अवकाश, विश्राम, ज्ञानार्जन, आध्यात्मिक विकास, मनोरंजन आदि। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो प्रायः यात्रा का उद्देश्य सकारात्मक होता है। यात्रा के दौरान स्वास्थ्य, सफाई एवं खान-पान संबंधी सावधानियों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। आवश्यक दवाइयों सामानों, दस्तावेजों एवं रुपयों को हमेशा साथ रखना चाहिए। किसी भी अनजान व्यक्ति पर भरोसा करना नुकसानदेह साबित हो सकता इस बात को ध्यान में रखना चाहिए।