स्वयंभू वीआईपी कल्चर का प्रकोप-डॉ.माणिक विश्वकर्मा ‘

Follow Us

आजकल स्वयंभू वीआईपी लोगों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। हर कोई अग्र पंक्ति में बैठना चाहता है, माला पहनना चाहता है चाहे वह उसके लायक हो या न हो। प्राय: हर कार्यक्रम में ऐसे चार- पाँच आकर्षक वेशभूषा में आये स्वयंभू वीआईपी अर्थात अतिविशिष्ट लोगों को देखा जा सकता है। ये इतने ढीठ होते हैं कि आमंत्रित अतिथियों के आने पर भी अपनी जगह से टस से मस नहीं होते। आमंत्रित अतिथियों को सीधे मंच पर जाने के लिए विवश होना पड़ता है। विगत दिनों कुछ कार्यक्रमों में यहाँ तक देखा है कि लोग अनाधिकृत या बिना अनुमति के बैठना अनुचित माना जाता है जानते हुए भी स्वयं तो ठसते ही हैं, अपने चहेतों के लिए भी बाकायदा सीट रोककर रखते हैं। ये तथाकथित अतिविशिष्ट लोग वे होते हैं जो आयोजक के मित्र होते हैं, रसूखदार होते हैं, सत्ताधारी होते हैं, समिति- संगठन से संबंधित होते हैं या सजातीय होते हैं लेकिन बुद्धिजीवियों की श्रेणी में कतई नहीं आते। यह नज़ारा अग्र पंक्ति तक ही सीमित नहीं है अपितु मंच पर भी खूब दिखाई देने लगा है। कभी-कभी तो मंच पर बैठने वालों के लिए कुर्सियाँ तक कम पड़ जाती है, अतिरिक्त लगवानी पड़ती है। बुके और मालाओं को दोबारा उपयोग करना पड़ता है। इन अनधिकृत रूप से बैठने वालों के कारण कार्यक्रम की गरिमा नष्ट होती है एवं आमंत्रित लोगों के बोलने के लिए समय कम पड़ जाता है। साथ ही पीछे बैठे वरिष्ठजनों का अपमान भी होता है। इसलिए कई वरिष्ठ लोग धीरे – धीरे इस तरह के कार्यक्रमों से दूरी बना लेते हैं। ऐसा अक्सर वे लोग करते हैं जो स्वयं को तुरमखां एवं दूसरों को आम श्रोता एवं दर्शक समझते हैं। यह प्रवृत्ति भारत में सुशासन और समानता के खिलाफ मानी जाती है।इस समस्या से बचने के लिए आयोजकों को पहले से ही मंच एवं सामने की सीटों के ऊपर अतिथियों एवं अतिविशिष्ट अतिथियों के नाम सहित सीटिंग व्यवस्था चार्ट चस्पा देना चाहिए। राजनीतिक एवं धार्मिक आयोजनों में भी स्वयंभू वीआईपी कल्चर अर्थात दिखावे की संस्कृति का बढ़ता चलन धीरे- धीरे सामाजिक समस्या का रूप लेता जा रहा है । पद एवं धन के बलबूते कुछ लोग स्वयं को आम जनता से श्रेष्ठ समझने लगे हैं। इसका खामियाजा आम नागरिकों को कभी भीड़ का सामना करके तो कभी घंटों लाइन में खड़े होकर भुगतना पड़ता है। देश में दो- तिहाई लोग ये मानते हैं कि वीआईपी कल्चर आज सिस्टम के लिए नासूर ?बना हुआ है। इसीलिए सर्वोच्च न्यायालय ने लाल बत्ती के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है। दरअसल स्वयंभू वीआईपी लोग हीन भावना से ग्रसित होने के कारण ये सोचकर आगे बैठने का प्रयास करते हैं कि शायद उनकी भी गणना बुद्धिजीवियों में होने लग , अख़बारों में प्रमुखता से फोटो आ जाए और चाय नाश्ता आसानी से सुलभ हो जाए क्योंकि कुछ कार्यक्रमों में अग्रिम पंक्ति में बैठने वालों के लिए ये सुविधा मुहैया होती है।इतिहास साक्षी है कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम,भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन, एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स एवं रिलायंस के संस्थापक धीरूभाई अंबानी अपनी कक्षाओं में पीछें बैठा करते थे।डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी की सहजता एवं सरलता से कौन वाकिफ़ नहीं है वे भी पीछे बैठने के हिमायती रहे।महान साहित्यकारों की लंबी फेहरिस्त है जो पहली कतार,चमक दमक एवं राजनीति से दूर शुद्ध भाव से सुनने, समझने एवं निष्पक्ष मूल्यांकन करने पीछे या कोने में बैठना पसंद करते थे। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद ताउम्र जमीन से जुड़े रहे वे भी सदैव आम लोगों के बीच बैठना पसंद करते थे। यह शाश्वत सच है कि साहित्य सुविधाओं पर आश्रित नहीं होता एवं एकांत में ही श्रेष्ठ विचारों का उदय होता है। साहित्य क्षेत्र में विशिष्ट का मतलब होता है दर्शन, तर्क क्षमता ,भाषा एवं साहित्य में सामान्य गुणों से अलग पहचान रखने वाला एवं अपने कार्यों, विचारों और दृष्टिकोण से समाज में एक अमिट छाप छोडऩे वाला नाकि दिखावटी व्यवहार, झूठे रुतबे और बातचीत के तरीके एवं पद, पैसा, संगठन या संस्था-समिति से ताल्लुक रखने वाला। विशिष्टजनों एवं अतिविशिष्टजनों की पहचान उनकी दूरदर्शिता, आत्म- जागरूकता, दृढ़ इच्छाशक्ति, सहानुभूति, प्रमाणिकता, समरसता की भावना, उत्कृष्ट संचार कौशल , निरंतर सीखने की आदत एवं विनम्रता जैसे गुणों के कारण होती है। स्वयंभू वीआईपी कल्चर के प्रकोप से बचने के लिए जरूरी है कि सरकारी कार्यक्रमों को छोड़ निजी कार्यक्रमों के आयोजक कोई भी कहीं भी बैठे एवं पहले आएँ पहले पाएँ की नीति अपनाएँ या जिन वरिष्ठजनों को आमंत्रित करें उन्हें यथोचित सम्मान देने की व्यवस्था करें।