मुंबई। नेटफ्लिक्स पर 4 जून को रिलीज़ हुई डार्क कॉमेडी फिल्म ‘माँ-बहन’ लगातार चर्चा में बनी हुई है। माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी और धारणा दुर्गा अभिनीत इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से शानदार प्रतिक्रिया मिली है। फिल्म की सफलता के बीच अब यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या इसे सीधे ओटीटी पर रिलीज़ करने के बजाय सिनेमाघरों में उतारा जाना चाहिए था। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की इस फिल्म को इसकी दमदार कहानी, सामाजिक संदेश और कलाकारों के अभिनय के लिए सराहा जा रहा है। कई दर्शकों का मानना है कि फिल्म के भावनात्मक, हास्य और व्यंग्य से भरपूर दृश्यों का प्रभाव बड़े पर्दे पर और ज्यादा देखने को मिलता। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी कहानी को माना जा रहा है, जो मनोरंजन के साथ-साथ पितृसत्तात्मक सोच पर भी सवाल उठाती है। बिना किसी भारी-भरकम भाषण के फिल्म समाज की कई विसंगतियों को सामने लाती है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।
अभिनय की बात करें तो तृप्ति डिमरी की परफॉर्मेंस को फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष बताया जा रहा है। दर्शकों का कहना है कि ‘बुलबुल’ और ‘कला’ के बाद एक बार फिर तृप्ति ने साबित किया है कि वह सिर्फ ग्लैमरस किरदारों तक सीमित नहीं हैं। वहीं माधुरी दीक्षित और रवि किशन जैसे अनुभवी कलाकारों ने भी अपनी भूमिकाओं से फिल्म को मजबूती दी है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स का मानना है कि ‘माँ-बहन’ जैसी महिला-केंद्रित और कंटेंट-ड्रिवन फिल्मों को सिनेमाघरों में भी मौका मिलना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसी फिल्में न केवल दर्शकों का मनोरंजन करती हैं, बल्कि हिंदी सिनेमा में अलग तरह की कहानियों के लिए रास्ता भी खोलती हैं। फिल्म की लोकप्रियता ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मजबूत कंटेंट वाली फिल्मों को सिर्फ ओटीटी तक सीमित रखना सही है या उन्हें बड़े पर्दे पर भी दर्शकों तक पहुंचना चाहिए।
