भारतीय पुलिस सेवा के नौजवान अधिकारी नरेंद्र कुमार ने 14 वर्ष पहले अवैध खनन के लिए कुख्यात चंबल अंचल के मुरैना जिले में अवैध रूप से खनन किए गए पत्थरों से भरी एक ट्रॉली को रोकने की कोशिश की थी। चालक ने ट्रॉली उनके ऊपर चढ़ाकर उनकी हत्या कर दी थी। मुरैना से लगभग 550 किलोमीटर दूर मालवा अंचल के देवास में कुछ दिन पहले इसी तरीके से एक और पुलिस अधिकारी निरीक्षक दिलीप पुरी की हत्या कर दी गई। इन दोनों घटनाओं में अंतर सिर्फ इतना है कि मुरैना में जहां ट्रॉली से कुचलकर एक अधिकारी को मारा गया था, वहीं देवास में ट्रक के पहिये से कुचलकर। मुरैना में अवैध खनन से निकाले गए पत्थरों को ले जा रही ट्रॉली को रोकने की कोशिश की गई थी, जबकि देवास में अवैध शराब की तस्करी रोकने का प्रयास किया गया। देवास जिले में जहरीली शराब पीने से 13 लोगों की मौत के बाद देवास पुलिस पर दबाव था कि वह जिले में अवैध शराब की आवाजाही रोकने की हर संभव कोशिश करे। खातेगांव के थाना प्रभारी दिलीप पुरी ने 1 नवंबर की रात अवैध शराब की तस्करी रोकने के लिए कार्रवाई की। दिलीप पुरी ने एक आयशर ट्रक चालक को नीचे उतरने और वाहन की जांच कराने के लिए कहा चालक ने कागजात दिखाने और ट्रक की जांच कराने के बजाय खतरनाक तरीके से ट्रक की गति बढ़ाकर भागने की कोशिश की। पुरी ट्रक के पहिये के नीचे आ गए और अस्पताल में उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने घटना पर दुख जताते हुए निष्पक्ष जांच और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। उन्होंने पुरी के परिवार को एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता तथा उनकी पत्नी को अनुकंपा के आधार पर उपनिरीक्षक के पद पर नौकरी देने की घोषणा भी की। सवाल यह उठता है कि क्या इस घटना से सबक लेते हुए शासन और प्रशासन माफिया के खिलाफ प्रभावी कदम उठाएंगे? और यदि कार्रवाई शुरू होती है, तो वह कितने दिन तक चलेगी? 14 वर्ष पहले मुरैना में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी नरेंद्र कुमार की हत्या के बाद भी यही लगा था कि अब अवैध खनन करने वालों की खैर नहीं। लोगों का मानना था कि पुलिस की वर्दी पर हमला, वह भी एक भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी पर, पूरे पुलिस बल के इकबाल पर हमला है। यह शासन के इकबाल को भी चुनौती है। सेवा में आए महज तीन वर्ष हुए थे कि नरेंद्र कुमार की हत्या कर दी गई। उस दिन पूरे देश में होली का त्योहार मनाया जा रहा था। यह पूरे देश के लिए बहुत बड़ी खबर थी मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, समूचे शासन-प्रशासन और पुलिस बल ने संकल्प लिया था कि अब हर हाल में खनन माफिया को करारा जवाब दिया जाएगा। उस जवाब का इंतजार आम जनता आज तक कर रही है। मुरैना में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी की हत्या के तीन वर्ष बाद उसी जिले के नूराबाद थाने में तैनात 38 वर्षीय आरक्षक धर्मेंद्र सिंह चौहान ने अवैध रूप से खनन की गई रेत ले जा रहे एक डंपर को रोकने की कोशिश की। डंपर चालक ने उन्हें वाहन से कुचलकर मार डाला। वर्ष 2020 में विंध्य अंचल के सतना जिले में 28 वर्षीय पुलिस आरक्षक प्रबल प्रताप सिंह ने अवैध रूप से डीजल ले जा रही ट्रैक्टर-ट्रॉली को उत्तर प्रदेश की सीमा पर रोकने की कोशिश की। लेकिन वाहन रोकने के प्रयास के दौरान आरोपियों ने उन्हें ट्रैक्टर-ट्रॉली से कुचल दिया। स्थानीय पुलिस ने इसे दुर्घटना बताया, लेकिन बाद में जिला पुलिस अधीक्षक ने इसे हत्या का मामला बताया और वरिष्ठ अधिकारियों को कथित रूप से गुमराह करने के आरोप में थाने के प्रभारी को निलंबित कर दिया। इसी तरह, मई 2024 में शहडोल जिले के ब्यौहारी थाने में तैनात 37 वर्षीय पुलिस उपनिरीक्षक महेंद्र बागरी ने अवैध रूप से खनन की गई रेत से भरे एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को रोकने की कोशिश की। बागरी वाहन को रोकने के लिए नीचे उतरे ही थे कि चालक ने उन्हें कुचल दिया। ऐसा नहीं है कि खनन और शराब माफिया के हाथों केवल पुलिस अधिकारी और जवान ही मारे गए हैं। माफिया से जुड़े हमलों में अन्य सरकारी कर्मचारी भी अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें वन विभाग और राजस्व विभाग के अधिकारी तथा कर्मचारी शामिल हैं। इन सभी मामलों में गिरफ्तारियां तो हुईं, कुछ मामलों में जांच अधिकारियों ने हत्या के बजाय दोषपूर्ण मानव वध की धाराएं लगाईं। लेकिन जांच का दायरा उन लोगों तक कभी नहीं पहुंचा जो पर्दे के पीछे बैठकर माफिया का साम्राज्य चलाते हैं। न उनके आका बेनकाब हुए, न उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारी और राजनीतिक चेहरे। आखिर माफिया के लिए अवैध खनन और शराब का कारोबार इतना सुरक्षित कैसे बना हुआ है? जब तक उसके सरगनाओं, आर्थिक हितों और राजनीतिक-प्रशासनिक संरक्षण की कड़ियों को नहीं तोड़ा जाएगा, तब तक नरेंद्र कुमार और दिलीप पुरी जैसे अधिकारी अपनी जान गंवाते रहेंगे।
मध्य प्रदेश: शहादत की तस्वीरें बदलती गईं, माफिया बेखौफ रहा- रंजन श्रीवास्तव
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