भारत का ‘जिब्राल्टर’ कहलाता है ग्वालियर किला, बाबर ने कहा था- ‘हिंद के किलों का मोती’

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नई दिल्ली। भारत के ऐतिहासिक किलों में मध्य प्रदेश का ग्वालियर किला अपनी भव्यता, अभेद्य संरचना और समृद्ध इतिहास के लिए खास पहचान रखता है। एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित यह किला सदियों से कई राजवंशों के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। इसकी मजबूती और सामरिक महत्व को देखते हुए मुगल सम्राट बाबर ने इसे “हिंद के किलों का मोती” कहा था, जबकि इसकी अजेय बनावट के कारण इसे “भारत का जिब्राल्टर” भी कहा जाता है।

इतिहासकारों के अनुसार, ग्वालियर किले का निर्माण आठवीं शताब्दी में राजा सूरज सेन ने कराया था। लगभग 35 फीट ऊंची और करीब दो मील लंबी इसकी विशाल दीवारें इसे भारत के सबसे मजबूत किलों में शामिल करती हैं। समय-समय पर इस किले पर पाल, प्रतिहार, तोमर, कछवाहा, लोधी, मुगल, मराठा और अंग्रेजों का शासन रहा। हर शासक ने इसकी वास्तुकला और इतिहास में अपनी अलग छाप छोड़ी।

ग्वालियर किले ने अनेक युद्ध और आक्रमण झेले हैं। मोहम्मद गोरी और इल्तुतमिश जैसे कई आक्रमणकारियों ने इस पर कब्जा करने की कोशिश की। इन हमलों के दौरान कई मूर्तियों और संरचनाओं को नुकसान पहुंचा, लेकिन किले की भव्यता और मजबूती आज भी बरकरार है।

इस किले की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रणनीतिक स्थिति है। ऊंची पहाड़ी पर बने होने और खड़ी चट्टानों जैसी मजबूत दीवारों के कारण दुश्मनों के लिए इस पर विजय प्राप्त करना बेहद कठिन था। यही वजह है कि इसे भारत का “जिब्राल्टर” कहा जाता है। ग्वालियर किले की वास्तुकला भी बेहद अनोखी है। यहां हिंदू, राजपूत और इस्लामी स्थापत्य कला का सुंदर संगम देखने को मिलता है। किले के भीतर स्थित मान सिंह महल अपनी रंगीन टाइलों और दीवारों पर उकेरी गई बत्तख, हाथी और मोर की आकृतियों के लिए प्रसिद्ध है।

किले में स्थित गुजरी महल, जिसे राजा मानसिंह तोमर ने अपनी रानी मृगनयनी के लिए बनवाया था, आज एक संग्रहालय के रूप में पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। इसके अलावा सास-बहू मंदिर अपनी उत्कृष्ट नक्काशी और तेली का मंदिर नागर एवं द्रविड़ शैली के अनोखे संगम के लिए प्रसिद्ध है।

धार्मिक दृष्टि से भी ग्वालियर किले का विशेष महत्व है। मान्यता है कि मुगल सम्राट जहांगीर ने सिखों के छठे गुरु गुरु हरगोबिंद साहिब को यहां दो वर्षों तक कैद रखा था। बाद में उन्होंने अपने साथ 52 हिंदू राजाओं की भी रिहाई करवाई। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में यहां दाता बंदी छोड़ गुरुद्वारा का निर्माण कराया गया। किले तक जाने वाले मार्ग में चट्टानों को काटकर बनाई गई जैन तीर्थंकरों की विशाल प्रतिमाएं भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इतिहास, वास्तुकला और संस्कृति का अनूठा संगम होने के कारण ग्वालियर किला आज भी देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण बना हुआ है।