यूरोप को लंबे समय तक आर्थिक समृद्धि, सामाजिक सुरक्षा, बेहतर जीवन स्तर और मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं का प्रतीक माना जाता रहा है। दुनिया के अनेक देशों के लिए यूरोपीय मॉडल एक उदाहरण रहा है, जहां नागरिकों को अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकार की मानी जाती है। लेकिन आज इसी यूरोप की सड़कों पर जिस तरह असंतोष दिखाई दे रहा है, वह उसकी आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था के सामने खड़े होते गंभीर सवालों की ओर इशारा करता है। महंगाई, बेरोजगारी, कम होती क्रयशक्ति, महंगे मकान, बढ़ते किराये और सरकारी नीतियों से नाराजगी ने आम नागरिकों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया है। फ्रांस से लेकर जर्मनी, इटली, स्पेन और ग्रीस तक विरोध प्रदर्शनों का फैलना इस बात का संकेत है कि आर्थिक विकास के आंकड़े और आम आदमी की जिंदगी की वास्तविकता के बीच दूरी बढ़ रही है। यूरोपीय संघ के 27 देशों में इस साल 19 अक्टूबर तक करीब 22 हजार प्रदर्शन दर्ज होना ही इस व्यापक बेचैनी को सामने रखता है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिस यूरोप ने दुनिया को कल्याणकारी राज्य और सामाजिक सुरक्षा का मॉडल दिया, वहां के नागरिक अपनी ही सरकारों के खिलाफ इतनी बड़ी संख्या में क्यों खड़े हो रहे हैं? इसका जवाब केवल महंगाई में नहीं, बल्कि उस आर्थिक व्यवस्था में छिपा है, जहां सरकारों के पास संसाधन सीमित होते जा रहे हैं और जनता की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। यूरोप में मौजूदा असंतोष का सबसे बड़ा केंद्र फ्रांस बनकर उभरा है। इस देश की राजनीतिक संस्कृति में सड़क पर उतरकर सरकार से जवाब मांगने की पुरानी परंपरा रही है। पेंशन सुधार से लेकर ईंधन की कीमतों तक, फ्रांस के नागरिकों ने कई बार बड़े आंदोलनों के जरिए सत्ता को अपनी ताकत का एहसास कराया है। लेकिन इस बार आंदोलन का स्वरूप कुछ अलग है। इसकी शुरुआत स्कूलों की जर्जर इमारतों, शिक्षकों की कमी और विश्वविद्यालयों की समस्याओं से हुई, लेकिन जल्द ही इसमें मजदूर, कर्मचारी, युवा, किसान और सरकार की आर्थिक नीतियों से नाराज दूसरे वर्ग भी शामिल हो गए। 17 अक्टूबर को फ्रांस में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 5.5 लाख और 24 अक्टूबर को 4.10 लाख लोग प्रदर्शन में शामिल हुए। 31 अक्टूबर को भी लगभग 3.2 लाख लोगों ने सड़कों पर उतरकर अपना विरोध दर्ज कराया। लगातार तीन सप्ताह तक इतनी बड़ी संख्या में लोगों का जुटना बताता है कि यह किसी एक फैसले के खिलाफ तात्कालिक नाराजगी नहीं है। यह शिक्षा, रोजगार, जीवनयापन की लागत और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर जमा हुआ असंतोष है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और उनकी सरकार के सामने चुनौती केवल प्रदर्शनकारियों को शांत करने की नहीं, बल्कि जनता का भरोसा दोबारा हासिल करने की है। सरकार यदि हर आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर पुलिस बल और गिरफ्तारी के जरिए नियंत्रित करने की कोशिश करेगी, तो असंतोष और गहरा सकता है। फ्रांस की अर्थव्यवस्था की सीमाएं भी सरकार के लिए मुश्किल बढ़ा रही हैं। धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ता सार्वजनिक कर्ज और बजट पर दबाव ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं, जिसमें सरकार के लिए एक तरफ कल्याणकारी खर्च बढ़ाना और दूसरी तरफ वित्तीय अनुशासन बनाए रखना आसान नहीं है। फ्रांस के बाद जर्मनी में युवाओं का सड़कों पर उतरना यूरोप के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है। जर्मनी को यूरोप की आर्थिक ताकत माना जाता है। मजबूत औद्योगिक ढांचा, रोजगार के अवसर और सामाजिक सुरक्षा उसकी पहचान रहे हैं। ऐसे देश के 34 शहरों में एक लाख से अधिक युवाओं का शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पर्यावरण के मुद्दों पर प्रदर्शन करना बताता है कि आर्थिक मजबूती का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा। युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल भविष्य का है। अच्छी शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार की अनिश्चितता, महंगे मकान और जीवनयापन की बढ़ती लागत उनके सपनों को सीमित कर रही है। युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें उनकी मेहनत के बाद एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन की संभावना हो। यह स्थिति यूरोप की सरकारों के लिए चेतावनी है। जिस पीढ़ी को लोकतांत्रिक व्यवस्था और आर्थिक विकास का सबसे बड़ा लाभार्थी होना चाहिए, यदि वही पीढ़ी व्यवस्था से निराश होने लगे तो समस्या केवल आर्थिक नहीं रह जाती। वह राजनीतिक और सामाजिक संकट का रूप लेने लगती है। महंगाई को अक्सर प्रतिशत के आंकड़ों में समझाया जाता है, लेकिन आम आदमी के लिए इसका मतलब महीने के अंत में बचने वाले पैसों से है। बिजली, गैस, पेट्रोल, भोजन, परिवहन और मकान का किराया बढने के बाद यदि वेतन उसी अनुपात में नहीं बढ़ता तो वास्तविक आय घट जाती है। कागज पर नौकरी और आमदनी होने के बावजूद परिवार आर्थिक दबाव में आ जाता है। यूक्रेन युद्ध युद्ध के बाद यूरोप ने ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों के मोर्चे पर भारी दबाव झेला। अब पश्चिम एशिया में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव ने ऊर्जा बाजार की अनिश्चितता को और बढ़ाया है। सितंबर 2026 के आंकड़ों के अनुसार यूरो क्षेत्र में महंगाई दर बढकर कीमर < प्रतिशत पहुंच गई, जबकि ऊर्जा की सालाना आधार पर 18.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करें। फ्रांस के आधिकारिक सांख्यिकी संस्थान के मुताबिक इसी अवधि में ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत डॉलर में सालाना आधार पर 51.1 प्रतिशत और यूरो में 54 प्रतिशत बढ़ी। प्राकृतिक गैस की थोक कीमतों में भी एक साल में 133.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। ऊर्जा की कीमतों का असर केवल वाहन चलाने या घर गर्म रखने तक सीमित नहीं रहता। उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ती है, परिवहन महंगा होता है और अंतत इसका बोझ खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की दूसरी वस्तुओं तक पहुंचता है। यही वजह है कि ऊर्जा संकट का सीधा संबंध महंगाई और रोजगार से भी है। इसके साथ आवास संकट ने युवाओं और मध्यम वर्ग की मुश्किलें बढ़ाई हैं। जिन शहरों में रोजगार के अवसर अधिक हैं, वहां मकान खरीदना या किराये पर रहना आम नौकरीपेशा लोगों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। जब किसी व्यक्ति की आय का बड़ा हिस्सा किराये और बिलों में चला जाए तो उसके पास बचत, परिवार, शिक्षा और भविष्य की योजनाओं के लिए बहुत कम गुंजाइश बचती है।
यूरोप में बढ़ता असंतोष…-संजय सक्सेना
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