बस्तर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में करीब 40 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ग्रामीण और शहरी आबादी माओवादी आतंक के साये से पूरी तरह मुक्त होकर दिवाली का त्योहार मना रही है। क्षेत्र में 31 मार्च को माओवादी हिंसा के अंत की आधिकारिक घोषणा के बाद से ही सुरक्षा वातावरण में व्यापक सुधार दर्ज हुआ है। पहले बारूद के धमाकों और आईईडी के डर से सहमे रहने वाले बस्तर के ग्रामीण इस वर्ष बिना किसी आशंका के बाजारों में आतिशबाजी तथा पूजन सामग्री की खरीदारी कर रहे हैं। संभाग के दूरस्थ अंचलों में शांति स्थापित होने के पश्चात पहली बार घरों के आंगन दीयों की रोशनी से जगमगा रहे हैं।
बारूदी खौफ से मुक्ति और बदलता माहौल: अतीत में संवेदनशील सुरक्षा शिविरों पर पटाखों की आड़ में हमले होने की आशंका बनी रहती थी, जिसके कारण अनेक गांवों में दिवाली पर पटाखों की बिक्री तथा प्रयोग पर सख्त प्रतिबंध लागू रहता था। इसके अतिरिक्त जंगलों एवं संपर्क मार्गों पर बिछाई गई बारूदी सुरंगों तथा आईईडी का डर ग्रामीणों को लगातार सतर्क रहने पर मजबूर करता था। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2001 से मार्च 2026 तक बस्तर संभाग के सात जिलों से कुल 4,607 आईईडी बरामद किए गए, जबकि इस दौरान 1,280 बारूदी विस्फोट की घटनाएं दर्ज हुईं। इस बार बीजापुर जिले के पटाखा बाजारों में यह सकारात्मक बदलाव स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है। माओवादी प्रभाव के लिए चर्चित रहे गंगालूर तथा उसूर जैसे अत्यंत संवेदनशील इलाकों में भी आतिशबाजी की दुकानें सजाई गई हैं।
बाजारों में रौनक और ग्रामीणों में उत्साह: स्थानीय विक्रेताओं तथा निवासियों के अनुसार इस बार ग्रामीण अंचलों से लोग बड़ी संख्या में पटाखे खरीदने बीजापुर और आसपास के बाजारों में पहुंच रहे हैं। लोग बताते हैं कि इस बार लोग निर्भय होकर उत्सव मनाने और आतिशबाजी करने की योजना बना रहे हैं। कारोबारियों के मुताबिक दूर-दराज के गांवों में भी त्योहार को लेकर अभूतपूर्व उत्साह देखा जा रहा है। सुकमा जिले के जगरगुंडा से लेकर अबूझमाड़ के बीहड़ इलाकों तक बुनियादी सुविधाओं जैसे सड़क निर्माण, बिजली आपूर्ति और पुख्ता सुरक्षा प्रबंधों की पहुंच से सामान्य जनजीवन तेजी से बहाल हुआ है।
परंपरा और दीयारी तिहार की बयार: बस्तर के आदिवासी समुदायों में दिवाली पर्व के साथ-साथ पारंपरिक ‘दीयारी तिहार’ भी बड़ी श्रद्धा के साथ आयोजित किया जाता है। नई फसल की कटाई संपन्न होने के बाद कृषि उपज तथा पशुधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु यह पर्व मनाया जाता है। उत्सव के दौरान ग्राम देवता, पूर्वजों तथा मवेशियों की विशेष पूजा-अर्चना होती है। दीयारी तिहार मनाने की तिथियां हर गांव की अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार तय की जाती हैं, जिनकी धार्मिक रस्में तीन दिनों से लेकर पूरे महीने तक चलती हैं। शांति व्यवस्था कायम होने के बाद स्थानीय निवासी अपनी इस पुरातन परंपरा को भी भयमुक्त वातावरण में खुशी से मना रहे हैं।

