धमतरी। जिले में कृषि विविधीकरण और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के लिए मखाना की खेती नई संभावनाएं लेकर आई है। ग्राम छाती और डांडेसरा में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा 29 एकड़ क्षेत्र में उत्पादित मखाना का संग्रहण शुरू हो गया है। महिलाओं को संग्रहण के बाद उपज की देखभाल और प्रसंस्करण की वैज्ञानिक तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, जिससे गुणवत्ता बेहतर होने और बाजार में उचित मूल्य मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
केंद्र सरकार की सेंट्रल सेक्टर स्कीम फॉर डेवलपमेंट ऑफ मखाना के तहत वर्ष 2025-26 में धमतरी जिले को तालाबों में मखाना की खेती के लिए 165 एकड़ का लक्ष्य मिला था। इसके मुकाबले जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग के तकनीकी मार्गदर्शन में 105 एकड़ क्षेत्र में खेती शुरू की गई। ग्राम राखी, छाती, डांडेसरा और पीपरछेड़ी के अलावा नगरी विकासखंड के ग्राम सांकरा में भी मखाना उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है।
ग्राम छाती और डांडेसरा में 26 अक्टूबर को शैलपुत्री स्व-सहायता समूह और नई किरण स्व-सहायता समूह की महिलाओं के लिए मखाना संग्रहण की शुरुआत और प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर ग्राम छाती-सेनचुवा की सरपंच दानेश्वरी साहू, जितेन्द्र कुमार साहू, पंचगण, कृषि विज्ञान केंद्र की विशेषज्ञ दीपिका चंद्रवंशी, उप संचालक उद्यानिकी पूजा कश्यप साहू, उद्यान विकास अधिकारी राहुल साहू और ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारी नर्मदा प्रसाद भारती उपस्थित रहे।
उप संचालक उद्यानिकी पूजा कश्यप साहू ने बताया कि महिला समूहों को आगामी दिनों में कृषि विज्ञान केंद्र, धमतरी में मखाना के संग्रहण-पश्चात प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसमें उपज की देखभाल, प्रसंस्करण और गुणवत्ता बनाए रखने की तकनीकों की जानकारी दी जाएगी, ताकि महिलाएं इस गतिविधि को आजीविका और उद्यमिता के रूप में आगे बढ़ा सकें।
मखाना की कटाई तीन चरणों में होती है। पहली कटाई को लहसर कहा जाता है, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत मखाना निकाला जाता है। इसके लिए श्रमिकों को सामान्यतः प्रति किलोग्राम के आधार पर मजदूरी दी जाती है। दूसरी और तीसरी कटाई को मरकट और कर्कट कहा जाता है। इन चरणों में शेष लगभग 30 प्रतिशत बीज निकाले जाते हैं, जिसके लिए अधिक मेहनत और समय की आवश्यकता होती है।
कटाई के बाद तालाब से निकाले गए मखाना के बीजों को अच्छी तरह साफ किया जाता है। काले बीजों को धोकर लगभग 2 से 30 दिनों तक तेज धूप में सुखाया जाता है, ताकि नमी कम हो सके। इसके बाद उन्हें भट्ठी या मिट्टी की कढ़ाई में भूनकर लकड़ी की थापी से फोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया से बीज के अंदर का सफेद और कुरकुरा मखाना बाहर निकलता है, जिसे स्थानीय रूप से लावा कहा जाता है।
कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने कहा कि जिले में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय संभावनाओं के अनुसार कृषि की नई गतिविधियों को बढ़ावा देना प्रशासन की प्राथमिकता है। मखाना की खेती किसानों की आय बढ़ाने और महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का माध्यम बन सकती है। इसके लिए उत्पादन के साथ वैज्ञानिक तकनीक, प्रसंस्करण, गुणवत्ता और बाजार से जुड़ाव पर ध्यान देना जरूरी है। प्रशासन का प्रयास है कि तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण से ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी बढ़े और वे आत्मनिर्भर आजीविका की दिशा में आगे बढ़ें।
मखाना उत्पादन की यह पहल धमतरी जिले में पारंपरिक कृषि के साथ नए विकल्प जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उचित प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण प्रसंस्करण और बाजार से बेहतर जुड़ाव मिलने पर यह ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार, स्वरोजगार और सामूहिक उद्यमिता के नए अवसर पैदा करने में सहायक होगी।

