हरियाणा के गुरु जांभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक लोकनृत्यों और लोकगीतों की आकर्षक प्रस्तुतियों

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भाटापारा। हरियाणा के हिसार स्थित गुरु जांभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर में छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति, पारंपरिक लोकनृत्यों और लोकगीतों की आकर्षक प्रस्तुतियों ने सभी का ध्यान आकर्षित किया। इस राष्ट्रीय स्तर के शिविर में स्व. रामनाथ वर्मा शासकीय महाविद्यालय, मोपका-निपनिया, जिला बलौदाबाजार-भाटापारा, छत्तीसगढ़ की राष्ट्रीय सेवा योजना कार्यक्रम अधिकारी डॉ. प्रियंका पाटले छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रही हैं।

शिविर में देश के 17 राज्यों से आए राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवक अपने-अपने राज्यों की सांस्कृतिक विरासत, परंपराओं और विशिष्टताओं को प्रस्तुत कर रहे हैं। राष्ट्रीय एकता शिविर का उद्देश्य विभिन्न राज्यों के युवाओं को एक साझा मंच प्रदान करना है, ताकि वे एक-दूसरे की संस्कृति, भाषा, रहन-सहन, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों को समझ सकें। इस आयोजन के माध्यम से युवाओं में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सद्भाव, आपसी सहयोग, नेतृत्व क्षमता और देश की विविध सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है।

शिविर में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से शामिल स्वयंसेवक रविकिशन साहू, तरुण साहू, गौरव साहू, संजू निषाद, दीप्ति साहू, रूपा साहू, हर्षिता यादव एवं खिलेश्वरी ने अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रदेश की पहचान को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया। इन स्वयंसेवकों ने छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध राउत नाचा, सुआ, पंथी नृत्य, ददरिया गीत और करमा नृत्य की प्रस्तुतियों से उपस्थित प्रतिभागियों को प्रदेश की लोकपरंपराओं से परिचित कराया। पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों की मधुरता, नृत्य की लयबद्धता और सामूहिक सहभागिता ने प्रस्तुतियों को विशेष आकर्षण प्रदान किया।

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छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान यहां के लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक त्योहारों और ग्रामीण जीवन से गहराई से जुड़ी हुई है। राउत नाचा प्रदेश की लोकपरंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो विशेष रूप से यादव समुदाय की परंपराओं और उत्सवों से जुड़ा है। वहीं पंथी नृत्य सतनाम पंथ की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा को अभिव्यक्त करता है। ददरिया छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय लोकगीत है, जो अपनी मधुरता और सहज भावाभिव्यक्ति के लिए जाना जाता है। करमा नृत्य भी प्रदेश सहित मध्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों की लोक-सांस्कृतिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इन विधाओं की प्रस्तुति के माध्यम से स्वयंसेवकों ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता और लोकजीवन की जीवंतता को सामने रखा।

कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों के स्वयंसेवकों को एक-दूसरे की सांस्कृतिक विशेषताओं को देखने और समझने का अवसर मिल रहा है। अलग-अलग भाषाओं, वेशभूषाओं, लोकगीतों और नृत्य शैलियों के बीच यह शिविर भारतीय संस्कृति की व्यापकता और विविधता को प्रदर्शित कर रहा है। छत्तीसगढ़ के स्वयंसेवकों की प्रस्तुतियों ने इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और अधिक रोचक बनाया तथा अन्य राज्यों के प्रतिभागियों को प्रदेश की लोककला और परंपराओं से परिचित होने का अवसर दिया। डॉ. प्रियंका पाटले इस शिविर में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वयंसेवकों की सहभागिता और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का नेतृत्व कर रही हैं।

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राष्ट्रीय स्तर के इस आयोजन में उनकी सहभागिता महाविद्यालय के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस प्रकार महाविद्यालय के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। राष्ट्रीय सेवा योजना विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, सामाजिक उत्तरदायित्व, अनुशासन, नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रसेवा की भावना को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। राष्ट्रीय एकता शिविर जैसे आयोजन स्वयंसेवकों को अपने राज्य की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ दूसरे राज्यों की परंपराओं को जानने, नए मित्र बनाने और सामूहिक रूप से कार्य करने का अनुभव प्रदान करते हैं। ऐसे अनुभव युवाओं में व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने तथा राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को आत्मसात करने में सहायक होते हैं।

डॉ. प्रियंका पाटले के मार्गदर्शन में छत्तीसगढ़ के स्वयंसेवक अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रदेश की लोकपरंपराओं, कला और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। शिविर में उनकी सहभागिता से छत्तीसगढ़ की विविध सांस्कृतिक विधाओं को अन्य राज्यों के प्रतिभागियों के समक्ष प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है।

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यह आयोजन इस संदेश को मजबूत करता है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी सांस्कृतिक विविधता, पारस्परिक सम्मान और एकता में निहित है। छत्तीसगढ़ के स्वयंसेवकों ने अपने लोकनृत्यों और लोकगीतों के माध्यम से “विविधता में एकता ही भारत की पहचान है” की भावना को अभिव्यक्त किया। राष्ट्रीय एकता शिविर में छत्तीसगढ़ की यह सांस्कृतिक सहभागिता प्रदेश की लोकपरंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और युवाओं के बीच सांस्कृतिक सौहार्द को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।