भारत भर में प्रतिवर्ष क्वांर और चैत्र के माह में नौ दिनों तक देवी मंदिरों में जोत जलाकर,जंवारा उगाकर मां दुर्गा के नव रूपों की पूजा की जाती है।लाल ध्वजा,चुनरी, चूड़ी,साड़ी और नींबू की माला से माता रानी की प्रतिमा का श्रृंगार किया जाता है।इस महापर्व के दौरान ‘कन्या भोजन कराने का जोरदार प्रचलन भी है।यह कुंवारी कन्याओं को देवी रूप में पूजने की प्रथा है। कहा जाता है कि ”बेटी खाएगी उसे देवी पाएगी ‘।
बेटी -बेटा में भेदभाव: चिंतनीय है कि बदलते वक्त के साथ इस प्राचीन परंपरा में बड़ी विकृतियां दिखाई दे रही हैं। बेटी- बेटा में भेदभाव करते हुए लोग बेटा जन्म में जश्न मनाते हैं किंतु बेटी जन्म लेती है तो ज्यादातर लोगों का मुंह लटक जाता है,मानो उन्हें सांप ने सुंघ लिया हो। ऐसी भयावह घटना भी सामने आ रही है कि चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति का दुरुपयोग करते हुए अनेक चिकित्सक और दम्पत्ति मिलकर कोख में पल रही कन्या भ्रूण की निर्मम हत्या कर दे रहे है। घर आती लक्ष्मी -सरस्वती और दुर्गा की जघन्य हत्या करके महापाप अपने सिर मोर ले रहे हैं। ऐसे अमानवीय कृत्यों में रत ‘कन्या भ्रूण हत्यारोंÓÓ की पूजा मां दुर्गा कैसे स्वीकार करेगी? इसी तरह अनेक परिवारों में कम दहेज देने वाली दुल्हन को प्रताडि़त करने, जलाकर मार डालने जैसा अकल्पनीय कृत्य किया जाता है। अनेक गांवों में नारी को डायन- टोनही कह कर मारा-पीटा जाता है। ऐसे अज्ञानी लोग पाप धुलने के भ्रम में नवरात्रि पर कन्या भोजन करवातें हैं। वे भूल जाते हैं कि घर परिवार की जीती जागती देवी के तिरस्कारियों को दुर्गा देवी कभी माफ नहीं करेगी। समाज में कई ऐसी घटनाएं भी उजागर हो रही हैं, जब बेटों ने माता- पिता की जमीन- जायदाद को हड़प कर मुंह फेर लिया है। इसके विपरीत फुटी कौड़ी की आस किए बिना बेटियों ने माता-पिता के दु:ख -दर्द को अपना समझा। उनकी जि़न्द$गी को संवारने में अपनी खुशी देखी। बेटियों की ऐसी महिमा पर कवि लिखते हैं-
पहाड़ों पर्वतों से टकराती नदियां सी होती है बेटियां। कच्चे- पक्के मकानों की मजबूत बिम्ब सी होती है बेटियां। बूढ़े कमजोर मां- बाप की लाठियां सी होती हैं बेटियां।।
मायके ससुराल में पराई बेटी: एक बेटी जन्म के बीस पच्चीस वर्ष मायके में बिताती है। ए सुनते सुनते कि बेटियां तो पराया धन होती हैं, दुर्भाग्य है कि विवाह उपरांत उन्ही बेटियों को ससुराल में भी जीवन भर पराया कहा जाता है। स्मरण कीजिए एक पौधे को मिट्टी से गमले में या गमले से मिट्टी में जब रोपा जाता है तो वह स्थान परिवर्तन की पीड़ा में मुरझा जाता है। वहीं बीस पच्चीस वर्षों तक मायके में पली बढ़ी बेटियां अपनी मिट्टी, अपना घर- परिवार छोड़कर, विछोह की वेदना भूलकर सदा के लिए ससुराल में जा बसती है। वहां भी माता- पिता की थोड़ी भी अकुशलता का समाचार मिलता है तो वह मायके जाने को मछली की भांति तडफ़ उठती है। वेद -पुराण इतिहास बताते हैं कि देवी की वरदान बेटियों होती हैं। रोते बिलखते परिवार को वे हंसा देती है। बेटी है तो सृष्टि है। पर्व, परम्पराएं बेटियों पर ही केंद्रित हैं। इसीलिए बेटियों की घटती संख्या के कारण अनेक रिश्ते-नाते,त्योहार समाप्ति की ओर हैं,अत: नवरात्रि पर्व में इन बातों पर गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता है। याद रखें बेटियां बची रहेंगी तो मानव मुस्कान बनी रहेगी। सच तो यह भी है-हर किसी के घर में जन्म लेती नहीं है बेटियां। परियां -शहजादी सी होती हैं बेटियां। इसीलिए पिता को महाराजा के समतुल्य बनाती हैं बेटियां।
