रेंजर कोदोरा ने नि:शुल्क जानकारी के बदले वसूले 668, फिर भी नहीं दी जानकारी
अम्बिकापुर। गेम रेंज कोदोरा में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी न देना अब महज एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार को छिपाने की सोची-समझी साजिश नजर आ रही है। प्रथम अपीलीय अधिकारी के कड़े रुख और नि:शुल्क जानकारी देने के स्पष्ट आदेश के बावजूद, गेम रेंजर द्वारा आवेदक से 668 वसूल लेना और फिर भी कैम्पा मद की कैशबुक न सौंपना, वन विभाग के इस पूरे खेल पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
आखिर कैम्पा फंड की कैशबुक में ऐसा क्या राज है
आरटीआई कार्यकर्ता कैम्पा मद के तहत संधारित कैशबुक की प्रमाणित छायाप्रति मांगी थी। वन विभाग में कैम्पा फंड के तहत पर्यावरण संरक्षण, वनीकरण और वन्यजीवों की सुरक्षा के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट आता है।अपीलीय आदेश के बावजूद इस जानकारी को जनता के सामने न आने देने से अब यह साफ होने लगा है कि कैशबुक के पाों में भ्रष्टाचार का कोई बड़ा खेल छुपा हुआ है। यदि कैम्पा फंड का पैसा ईमानदारी से खर्च हुआ है, तो अधिकारी उसे सार्वजनिक करने से इस कदर डर क्यों रहे हैं।
आदेश की अवहेलना और अवैध वसूली: भ्रष्टाचार की दोहरी परत
इस मामले में गेम रेंजर कोदोरा ने भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए दोहरे नियम तोड़े हैं:
1. वरिष्ठ अधिकारी के आदेश का अपमान: प्रथम अपीलीय अधिकारी (उप निदेशक, एलीफेंट रिजर्व सरगुजा) के लिखित आदेश को ठेंगा दिखा दिया।
2. सरेआम अवैध वसूली: जब कानूनन जानकारी नि:शुल्क देनी थी, तब आवेदक पर दबाव बनाकर 668 जमा करा लिए गए, ताकि मामले को लटकाया जा सके।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
पैसे ऐंठने के बाद भी जानकारी को दबाए रखना यह साबित करता है कि वन विभाग के निचले स्तर के अधिकारी खुद को कानून से ऊपर समझने लगे हैं। आरटीआई कार्यकर्ता का कहना है कि इस मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कैम्पा फंड के नाम पर जमीनी स्तर पर क्या काम हुए हैं और कैशबुक में क्या हेरफेर है, इसकी आडिटिंग जरूरी है। यदि राज्य सूचना आयोग इस पर कड़ा संज्ञान लेता है, तो दोषी गेम रेंजर पर 25,000 के जुर्माने के साथ-साथ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत भी गाज गिर सकती है।
