सोता प्रशासन भसकता भवन-विजय मिश्रा

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अपने पुरखों की वसीयत संभालो यारों वरना इस बारिश में यह दीवार भी गिर जाएगी। किसी कवि के मन में उपजे ए विचार मेरे मन में उमड़ घुमड़ रहे हैं। दरअसल देश के अनेक शहरों में आए दिन बड़े-बड़े पुराने भवन भरभरा कर जमींदोज हो रहे हैं। हमारे पुरखों ने सैकड़ों वर्ष पहले जिन ऊंचे पूरे भवनों को भावनाओं के ईंट गारे से बनवाया था वे जर्जर होते हुए अपनी सुरक्षा की बाट जोह रहे हैं। अपनी जीर्ण -शीर्ण दशा पर आंसू बहाते हुए जीर्णोद्धार के लिए या फिर इच्छामृत्यु अर्थात जमींदोज कर देने के लिए मालिक -प्रशासन का मुंह ताक रहे हैं। अत्याधुनिक बंगले, हाईटेक गगनचुंबी इमारतों के बीच ऐसे भवनों की हालत घर-परिवार में उपेक्षित बुजुर्गों की भांति हो चली है। पुराने भवनों और बुजुर्गों के बारे में एक आम धारणा है कि वे किसी काम के नहीं हैं। बेकार बेकाम के सामानों से लदे बोझा की तरह हैं। परिजनों से उपेक्षित ऐसे बुजुर्गों और भवनों की देखभाल, देखरेख की प्रशासनिक जिम्मेदारी या कहें नैतिक दायित्व सरकार की भी होती है। ऐसे मामलों में सरकार की उदासीनता धन-जन की हानि का बड़ा कारण बनती है। हाल ही में दिल्ली के पुराने भवन के गिर जाने से उसमें निवासरत विद्यार्थियों की मृत्यु हो गई। प्रिंट इलेक्ट्रानिक मीडिया में खूब हल्ला मचा, आमजन भी शासन प्रशासन के खिलाफ हल्ला बोलते रहे। कुछ दिनों के बाद मामला शांत पड़ गया। स्थिति यही है कि प्रशासन बेखबर सो रहा है और जर्जर पुराने भवन रोज भरभराकर गिर रहे हैं। ज्यादातर ऐसे भवन, कानूनी अड़चन में फंसे होते हैं, अथवा मालिकों की मंशा इनके प्रति बिना काम के बुजुर्गों की भांति होती है। इन पर खर्च करना उन्हें अपव्यय प्रतीत होता है। ऐसी स्थिति में जनहित में आगे आकर प्रशासन को त्वरित एक्शन लेना चाहिए। खंडहर में तब्दील होते ऐसे निजी भवनों के अलावा अनेक सार्वजनिक और शासकीय भवनों की भी स्थिति भयावह है। अनेक विद्यालय- महाविद्यालय और उनके छात्रावासों की सूरत तो भुतालय की तरह बन चुकी है। समाचार पत्रों में प्रायः ऐसे भवनों की तस्वीरें आती हैं जिन्हें देखकर लगता है कि भूत भी ऐसे भवनों से भयभीत होकर वहां से भाग गए होंगे, लेकिन हमारे शासन- प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी,शिक्षित- अशिक्षित जनप्रतिनिधि मस्तराम मस्ती में आग लगे बस्ती में की विचारधारा में डूबे रहते हैं। कहीं कोई दुर्घटना घट जाती है तो पीड़ित परिवारों को कुछ मुआवजा की घोषणा करके चुपचाप निकल लेते हैं। ऐसे तात्कालिक हल समस्या के स्थाई समाधान नहीं हो सकते। बेहतर कदम तो यही होगा कि समस्त जर्जर भवनों को चिन्हित करके कड़ाई पूर्वक कारवाई करें। एक बार पुरजोर अभियान चलाकर जर्जर भवनों पर बेधड़क बुलडोजर चलवा दें। बेहद चिंतनीय बात तो यह भी सामने आई है कि राजधानी रायपुर में ही पचास स्कूल भवनों को जर्जर घोषित किया गया है। फिर भी ऐसे भवनों में देश के भावी कर्णधार अध्यनरत हैं। देश की नींव मजबूत करने के लिए सदाचरण का पाठ पढ़ रहे हैं। इसकी जानकारी होने के बावजूद प्रशासन की कुर्सी (शैय्या) पर सोए जिम्मेदार लोगों की नींद नहीं टूट रही है। पुराने अनुभव को देखते हुए कह सकते हैं कि शायद ऐसे शाला भवनों के धराशायी होने, शिक्षकों छात्रों के घायल होने अथवा कुछ बड़ी अनहोनी होने की प्रतीक्षा में सरकार के हुक्मरान होंगे। कोई दुर्घटना के बाद मंत्री जी मुआइना करने, संवेदना व्यक्त मुआवजा की घोषणा करने जाएंगे। फोटो सहित समाचार छपवाएंगे। यह हालत देश की बिगड़ती कानून व्यवस्था को उजागर कर रही है। भवनों का गिरना, बूढ़े बुजुर्गों की लावारिस लाशों का मिलना उतना खतरनाक नहीं है, जितना कि शासन-प्रशासन का इन मामलों से बेखबर होकर चैन की नींद सो जाना। बढ़ती आबादी, बढ़ते वाहन और बढ़ते भवनों को दृष्टिगत रखते हुए शहरों की सुंदरता स्वच्छता और सुरक्षा हेतु अनेक शासकीय विभाग संचालित है। इनमें आपसी तालमेल का अभाव भी जर्जर भवनों को गिराने की राह में रोड़ा बनता है। इसे भी विभिन्न माध्यमों से शासन प्रशासन तक पहुंचाया जाता है अतः भलाई इसी में है कि समय रहते समस्याओं का त्वरित निराकरण सरकार कर दें। जर्जर भवन का सिर उठाकर खड़े रहना अथवा अनायास भरभराकर गिर जाना ए दोनों ही बातें संकेत देती हैं कि सरकारी व्यवस्था भी ढुलमुल -जर्जर हो चुकी है। सरकार को चाहिए कि नोटिस नोटिस का खेला लम्बा खींचने के बजाय सरकारी तंत्र को बदनाम करते ढहते हुए भवनों, गिरती हुई इमारतों को सर्वोच्च प्राथमिकता से नेस्तनाबूत कर दे।ना रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी,ना रहेगा डर ना होगी सरकारी किरकिरी। अगर देर हुई तो जनता सवाल उठाएगी प्रदेश में सुशासन का दौर है कि सोशासन चल रहा है।