ब्रिक्स सम्मेलन और भारत- संजीव वर्मा

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नई दिल्ली में संपन्न 18वां ब्रिक्स सम्मेलन बदलती विश्व व्यवस्था में एकजुटता के संदेश के साथ संपन्न हो गया। इस सम्मेलन का निष्कर्ष उत्साहजनक रहा है। 11 सदस्यों वाले ब्रिक्स के हित भले ही एक जैसे ना हो, लेकिन एक ही छत के नीचे जिस तरह से भविष्य के लिए एजेंडा और रोडमैप तय किया गया वह असाधारण है। इसके लिए भारत की प्रशंसा की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति ने जो कर दिखाया वह दूसरे देशों खासकर अमेरिका के लिए चुभने वाले हैं। जिस तरह एक मंच पर दुनिया के उभरते अर्थव्यवस्था वाले देशों ने अपनी ताकत दिखाई है, वह लंबे समय तक याद रखा जाएगा। हालांकि नई दिल्ली घोषणा पत्र में कहीं भी अमेरिका का जिक्र नहीं है, लेकिन चीन, रूस, ईरान और भारत के रुख ने अमेरिकी वर्चस्व को सीधी चुनौती दी है। मुख्य रूप से टैरिफ वार और डॉलर की जगह स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने की मंशा अमेरिका के हितों पर कुठाराघात है। चूंकि प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्था वाले इस समूह के देशों की संयुक्त आबादी दुनिया के करीब 50% है जबकि वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में इनकी हिस्सेदारी 40% है। जो यह दर्शाता है कि वह किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समूह के मुकाबले कमतर नहीं है। इस सम्मेलन में जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ब्रिक्स को सिर्फ सरकारों का मंच नहीं, बल्कि आम लोगों की तरक्की का माध्यम बनाने पर जोर दिया, वह काबिल-ए-गौर है। मोदी ने कहा, ब्रिक्स का सहयोग सरकारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, इसमें उद्यमियों, किसानों, शोधकर्ताओं, महिलाओं, युवाओं और आम नागरिकों को भी शामिल किया जाए। इसके लिए उन्होंने डिजिटल कृषि से संबंधित ब्रिक्स नेटवर्क का जिक्र किया, जिसका उद्देश्य एआई, भू-स्थानिक तकनीक और डिजिटल बुनियादी ढांचे को किसानों की जरूरतों से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि बढ़ते संघर्ष, आपूर्ति श्रृंखला में अवरोध वैश्विक विकास के लिए गंभीर चुनौती हैं। दुर्लभ खनिजों और तकनीक को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इन कदमों से दुनिया की तरक्की पर असर पड़ता है। पीएम ने कहा, ब्रिक्स केवल देशों का एक समूह नहीं है, बल्कि समाधानों का एक तंत्र है। हमें उम्मीद है कि इस शिखर सम्मेलन में अपनाया गया नई दिल्ली घोषणापत्र हमारे साझा दृष्टिकोण और भविष्य के सहयोग को स्पष्ट दिशा देगा। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स देशों के लिए स्वतंत्र बीमा तंत्र और साझा अनाज बाजार बनाने का प्रस्ताव रखा है। पुतिन ने सदस्य देशों और वैश्विक दक्षिण से वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए एक समग्र और स्वतंत्र दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। वहीं, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अमेरिका और पश्चिमी देशों पर परोक्ष निशाना साधते हुए कहा, वैश्विक मामलों में फैसले ताकत से नहीं होने चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानून और नियम सभी देशों पर समान रूप से लागू हों। वैश्विक नियम सभी देशों की भागीदारी से बनें। निश्चित रूप से जिनपिंग की बात महत्वपूर्ण है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली सोच को बहुत पहले खारिज कर देना चाहिए था। नियमों के बिना दुनिया ऐसी है, जैसे बिना ट्रैफिक लाइट वाला चौराहा, जहां अराजकता व अव्यवस्था तय है। अंतरराष्ट्रीय मामलों में दोहरे मानदंड खत्म करने की जरूरत है। किसी देश के आकार, ताकत या संपदा के आधार पर उसके साथ अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। वैश्विक दक्षिण के देश कानून के शासन को बनाए रखने में मदद करें। इस सम्मेलन में भारत की कूटनीति की एक और जीत के रूप में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के रिश्तों में सकारात्मक बदलाव देखने को मिला। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन और अबू धाबी के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद अल नाहयान की आमने-सामने बातचीत के बाद दोनों देश संबंधों को फिर बेहतर करने पर सहमत हो गए हैं। ब्रिक्स का जो मंच भारत ने दिया उसका फायदा सदस्य देशों ने आपसी समझ बढ़ाने के लिए भी किया। बहरहाल, सम्मेलन में सदस्य देशों ने मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर वैश्विक शासन और व्यापार व्यवस्था की भी मांग की। इन सबके बीच बिना किसी विवाद को जन्म दिए संयुक्त प्रस्ताव पारित होना भारत की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। हालांकि, कई बार घोषणाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाती हैं। ऐसे में यह समय ही बताएगा कि नई दिल्ली घोषणापत्र को जमीन पर लागू किया जाता है या नहीं।