‘अफीम की खेती और राजनीति – संजीव वर्मा

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प्रदेश में इन दिनों ‘अफीम की खेती की चर्चा जोरों पर है। इस मुद्दे पर विपक्ष सड़क से लेकर सदन तक हल्ला बोल रहा है। दरअसल, दुर्ग जिले में एक भाजपा नेता के खेत में अफीम की अवैध खेती का मामला सामने आने के बाद विपक्ष बिफरा हुआ है। अब यह केवल अपराध का नहीं बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। इस घटना ने विधानसभा से लेकर सियासी बयानबाजी तक राज्य की राजनीति को पूरी तरह गरमा दिया है। दुर्ग के बाद अब बलरामपुर जिले में भी अफीम की अवैध खेती का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि कुसमी थाना क्षेत्र के त्रिपुरी गांव में बाहरी व्यक्ति लीज पर जमीन लेकर अफीम की खेती कर रहा था। निश्चित रूप से करोड़ों रुपये की ‘अफीम की खेतीÓ का खुलासा होना कई सवाल खड़े करता है। इस मामले में पुलिस ने भाजपा से जुड़े नेता विनायक ताम्रकार समेत कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है। घटना सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी ने आरोपी नेता को निलंबित कर दिया, लेकिन तब तक यह मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका था। नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरण दास महंत ने कहा कि प्रदेश में सूखे नशे का जाल फैल रहा है और किसानों का धान नहीं खरीदा जा रहा है। ऐसे में लगता है कि राज्य को ‘धान का कटोराÓ से ‘अफीम का कटोराÓ बनाने की कोशिश हो रही है। विपक्ष ने इस घटना को सरकार की नैतिकता और प्रशासनिक व्यवस्था से भी जोड़ दिया। कांग्रेस का आरोप है कि राज्य में नशे का कारोबार बढ़ रहा है और सत्ता से जुड़े लोग ही इसमें लिप्त पाए जा रहे हैं। उसने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। दूसरी ओर सत्ता पक्ष का तर्क है कि अपराध किसी भी दल या व्यक्ति से जुड़ा हो सकता है और पुलिस की कार्रवाई यह साबित करती है कि सरकार अवैध गतिविधियों पर सख्ती से कार्रवाई कर रही है। दरअसल इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल राजनीतिक नैतिकता और जवाबदेही का है। जब किसी राजनीतिक दल से जुड़ा व्यक्ति इस तरह के गंभीर अपराध में पकड़ा जाता है, तो इसका असर केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की छवि पर पड़ता है। यही कारण है कि विपक्ष ऐसे मामलों को बड़ा मुद्दा बनाता है। हालांकि यह भी सच है कि राजनीति में कई बार आपराधिक घटनाओं को तुरंत राजनीतिक हथियार बना लिया जाता है। इससे असली समस्या-यानी अवैध मादक पदार्थों की खेती और उसके नेटवर्क पर गंभीर चर्चा पीछे छूट जाती है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में आर्थिक चुनौतियां भी मौजूद हैं, वहां ऐसी गतिविधियों के पीछे काम कर रहे संगठित नेटवर्क की जांच ज्यादा जरूरी है। अवैध अफीम की खेती का मामला राजनीतिक बहस जरूर पैदा करता है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या राज्य में अवैध नशे के कारोबार पर प्रभावी नियंत्रण हो पा रहा है। यदि सरकार और राजनीतिक दल इसे केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखते हैं, तो समस्या का समाधान मुश्किल होगा। जरूरत इस बात की है कि कानून का निष्पक्ष पालन हो और राजनीति से ऊपर उठकर ऐसे अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। यह घटना एक और गंभीर प्रश्न उठाती है-क्या राज्य में अवैध मादक पदार्थों का नेटवर्क धीरे-धीरे पैर पसार रहा है? यदि ऐसा है, तो यह केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक चिंता का विषय भी है। नशे का अवैध कारोबार समाज के युवाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित करता है। इसलिए प्रशासन के लिए जरूरी है कि वह केवल एक मामले की कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे नेटवर्क की गहन जांच करे। यह घटना राजनीति के लिए भी एक कसौटी है। यदि राजनीतिक दल इसे केवल आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाते हैं, तो इससे लोकतंत्र की विश्वसनीयता कमजोर होगी। लेकिन यदि इसे व्यवस्था सुधार और सख्त कानून-व्यवस्था की दिशा में एक चेतावनी के रूप में लिया जाए, तो यह घटना एक सकारात्मक बदलाव की शुरुआत भी बन सकती है। लेकिन अब भी वही सवाल सबके सामने यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा है कि क्या प्रदेश में नशे के बढ़ते खतरे को समय रहते रोक पाएंगे या यह भी राजनीतिक बहसों में उलझकर रह जाएगा।