समीक्षा का मतलब होता है बिना किसी पूर्वाग्रह के व्यक्तिगत संबंधों को ताक में रखकर निष्पक्ष रूप से किसी वस्तु या पुस्तक के सभी पहलुओं के गुणदोषों एवं विशेषताओं की सहीं एवं न्यायसंगत मूल्यांकन करना। सामान्यत: समीक्षा के दायरे में प्रकाशन, साहित्यिक कृतियाँ, फिल्म, कला-संगीत, विभिन्न उद्योग एवं उनके उत्पाद तथा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, वैज्ञानिक और समसामयिक गतिविधियां आती हैं। बात यदि साहित्यिक समीक्षाओं की करें तो इसमें वस्तुनिष्ठता, तथ्यात्मकता, संक्षिप्तता, आलोचनात्मकता एवं मार्गदर्शन का विशेष महत्व होता है। समीक्षा शब्द सम -पूरी तरह एवं ईक्षा- देखना या परखना से मिलकर बना है। साहित्यिक समीक्षाओं में गद्य या पद्य को पढ़कर उसके प्रभाव एवं सार्थकता पर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है। सार्थक समीक्षा वो मानी जाती है जिसमें महत्वपूर्ण बिंदुओं का स्पष्ट, पारदर्शी और तर्कसंगत संतुलन तथा साक्ष्य आधारित विश्लेषण होता है। समीक्षा के दौरान की गई अनावश्यक प्रशंसा से चाटुकारिता की गंध आने लगती है। समीक्षकों को इस बात को सदैव अपने ध्यान में रखना चाहिए। आजकल किसी पुस्तक के आरंभ में जो लिखवाई गई समीक्षा रूपी प्रस्तावना होती है वो रचनाकार की अतिरेक प्रशंसा से भरी रहती है। उसे पढऩे के बाद यदि पुस्तक की रचनाएँ प्रस्तावना के अनुरूप न मिलीं तो सीधे-सीधे प्रस्तावना लिखने वाले की बुद्धिमत्ता एवं विवेचना पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। प्रस्तावना प्रस्तुत कृति का परिचय एवं उद्देश्य बताती है जबकि समीक्षा गुण एवं दोषों के आधार पर किये गए मूल्यांकन को बताती है। आजकल कुछ लोगों को प्रस्तावना लिखने का चस्का होता है तो कुछ लोग निर्धारित रकम या उपहार लेकर मन मुताबिक समीक्षा/प्रस्तावना लिखने को आज अपनी कमाई का जरिया बना लिए हैं। इस प्रकार लिखी गई प्रस्तावनाओं एवं समीक्षाओं का कोई औचित्य नहीं होता। न ही रचनाकार के लिए न ही पाठकों के लिए। समीक्षा वही सार्थक मानी जाती है जिसका सरोकार रचना की गुणवत्ता से एवं रचनाकार को सहीं दिशा दिखाने से होता है। रचनाकार की झूठी प्रशंसा करने से नहीं। मुँहदेखी समीक्षाएँ प्राय: सच्चाई से दूर चापलूसी और पक्षपात भरी होती है एवं औपचारिकता निभाने के उद्देश्य से आयोजक या रचनाकार को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। उत्कृष्ट समीक्षा गुणदोष व्यक्त करते हुए विशिष्ट तर्क का माहौल बनाती है साथ ही रचयिता और अन्य पाठकों के साथ संवाद और चर्चा करने का अवसर प्रदान करती है। समीक्षा पाठकों को समग्र दृष्टिकोण, तर्क या उद्देश्य सहित विषय वस्तु का सारांश प्रदान करते हुए क्यों पसंद करने लायक है यह भी बताती है। अत: समीक्षक इस बात को गाँठ बाँधकर रखें कि समीक्षा की सार्थकता किसी विषय, पुस्तक, कला या शोध के गुण- दोषों का निष्पक्ष विश्लेषण करने, सही दिशा दिखाने और पाठकों को जागरूक करने में है न कि लफ्फ़़ाज़ी में।
समीक्षा की सार्थकता-डॉ.माणिक विश्वकर्मा
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