रायपुर। रायपुर नगर निगम में भुगतान में देरी और कथित कमीशनखोरी के विरोध में सिविल ठेकेदारों ने मोर्चा खोल दिया है। नगर निगम कार्यालय के सामने प्रदर्शन कर रहे ठेकेदारों का आरोप है कि बिना कमीशन दिए फाइलें आगे नहीं बढ़तीं और 100 करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान महीनों से लंबित है। उनका कहना है कि मजबूरी में अब काम बंद कर आंदोलन करना पड़ रहा है। ठेकेदारों का आरोप है कि कई मामलों में 6 महीने से लेकर डेढ़ साल तक भुगतान नहीं हुआ है। बैंक से कर्ज लेकर काम करने वाले ठेकेदार ब्याज का बोझ उठा रहे हैं, जबकि निगम में भुगतान की प्रक्रिया कथित तौर पर कमीशन के बिना आगे नहीं बढ़ रही।
प्रदर्शन कर रहे ठेकेदारों ने आरोप लगाया कि हर फाइल का अलग-अलग “रेट” तय है और 30 से 40 प्रतिशत तक कमीशन मांगा जाता है। उनका दावा है कि जीएसटी, सिक्योरिटी और अन्य वैधानिक कटौतियों के बाद भी अतिरिक्त रकम की मांग की जाती है। कुछ ठेकेदारों ने यह भी आरोप लगाया कि जोन स्तर पर भी प्रतिशत तय कर भुगतान की प्रक्रिया प्रभावित की जाती है। ठेकेदारों ने अधिकारियों पर बेगारी करवाने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि कई बार मुफ्त में अतिरिक्त काम कराया जाता है, जबकि समय पर काम पूरा नहीं होने पर पेनल्टी ठेकेदारों पर ही लगा दी जाती है। वहीं, गुणवत्ताहीन कार्यों को स्वीकार करने और बाद में उसकी जिम्मेदारी ठेकेदारों पर डालने का भी आरोप लगाया गया।
एक ठेकेदार ने आरोप लगाया कि जोन-7 से जुड़े एक मामले में उनसे जबरन सामान खरीदवाया गया, जिसके कारण उन्हें कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ा। उनका दावा है कि करीब डेढ़ करोड़ रुपये का भुगतान अब भी लंबित है और कई शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। सिविल ठेकेदार संघ के अध्यक्ष दुर्गेश ने कहा कि नगर निगम में रिश्वतखोरी और कमीशनखोरी कोई नई बात नहीं है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में हालात और खराब हुए हैं। उनका आरोप है कि ठेकेदारों से मिलने तक पर प्रतिबंध जैसे हालात बना दिए गए हैं और कई बार फाइलों का पता तक नहीं चलता। ठेकेदारों ने नगरीय प्रशासन मंत्री और राज्य सरकार से पूरे मामले की स्वतंत्र एवं पारदर्शी जांच, लंबित भुगतान जारी करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इस संबंध में महापौर मीनल चौबे और नगर निगम आयुक्त संबित मिश्रा से भी पक्ष जानने का प्रयास किया गया, लेकिन खबर लिखे जाने तक उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
