प्रार्थना नहीं संस्कारों का पाठ छत्तीसगढ़ सरकार का यह बड़ा फैसला

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रायपुर । छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा स्कूलों में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र, भोजन मंत्र, गायत्री मंत्र और शांति मंत्र को शामिल किए जाने के निर्णय पर कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं। इसे धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ बताया जा रहा है। ऐसे लोगों के विचारों से मै असहमत हूं। मुझे लगता है यह निर्णय धर्म विशेष का प्रचार नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का प्रयास है। सबसे पहले यह समझना होगा कि विद्यालय केवल परीक्षा पास करने की फैक्ट्री नहीं होते। उनका उद्देश्य अच्छे अंक लाने वाले विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि अच्छे नागरिक तैयार करना भी होता है। दुनिया की हर विकसित सभ्यता अपने बच्चों को केवल किताबों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि अपने इतिहास, परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों से भी परिचित कराती है। भारत यदि अपने बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना चाहता है तो इसमें गलत क्या है? कुछ लोग पूछ रहे हैं कि स्कूल में पढ़ाई होनी चाहिए या प्रार्थना? यह सवाल ही अधूरा है। क्योंकि भारत की शिक्षा परंपरा में ज्ञान और संस्कार दोनों साथ-साथ चलते रहे हैं। सरस्वती वंदना का अर्थ किसी एक धर्म की पूजा नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति सम्मान है।

गुरु मंत्र शिक्षक और ज्ञान परंपरा के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। भोजन मंत्र भोजन के प्रति कृतज्ञता का भाव सिखाता है। गायत्री मंत्र मन की एकाग्रता और सकारात्मक चिंतन का संदेश देता है, जबकि शांति मंत्र समाज और विश्व कल्याण की कामना करता है। इनमें कहीं भी किसी दूसरे धर्म के प्रति विरोध, घृणा या असहिष्णुता का भाव नहीं है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ अपनी संस्कृति से घृणा करना नहीं होता। भारतीय संविधान ने कभी यह नहीं कहा कि भारत अपनी सभ्यता, अपनी परंपराओं और अपने सांस्कृतिक प्रतीकों को भूल जाए। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी आस्थाओं का सम्मान। एक और तर्क दिया जा रहा है कि इससे वैज्ञानिक सोच प्रभावित होगी। यह तर्क भी तथ्यों से परे है। दुनिया को शून्य देने वाला भारत, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान और दर्शन की महान परंपरा वाला भारत, उसी संस्कृति से निकला है जिसे आज कुछ लोग पिछड़ा साबित करने में लगे हैं। आर्यभट्ट और भास्कराचार्य की भूमि पर विज्ञान और संस्कृति कभी एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहे। जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश आधुनिक तकनीक में अग्रणी हैं, लेकिन अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को भी उतना ही महत्व देते हैं।

आधुनिकता और सांस्कृतिक चेतना साथ-साथ चल सकती हैं। आदिवासी समाज और अन्य समुदायों को लेकर भी भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। जबकि भारत की संस्कृति का मूल भाव ही विविधता में एकता है। आदिवासी परंपराओं में भी प्रकृति, धरती, जल, वन और पूर्वजों के प्रति सम्मान का भाव है। सनातन संस्कृति भी यही सिखाती है कि मातृभूमि, प्रकृति और ज्ञान का सम्मान किया जाए। इसलिए इसे किसी समुदाय के खिलाफ खड़ा करना केवल राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है, सामाजिक या सांस्कृतिक नहीं। सच्चाई यह है कि आज पूरी दुनिया अपनी जड़ों की ओर लौट रही है। इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है, लेकिन रामायण वहां की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। मलेशिया और थाईलैंड में भी भारतीय सभ्यता के अनेक प्रतीकों का सम्मान किया जाता है। जब दूसरे देश अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व कर सकते हैं, तो भारत अपनी हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा पर गर्व क्यों न करे? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन यह भी सच है कि संघ ने हमेशा भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता की बात की है। अपनी संस्कृति का संरक्षण करना किसी के खिलाफ होना नहीं है। अपने पूर्वजों, अपने ज्ञान और अपनी मातृभूमि का सम्मान करना सांप्रदायिकता नहीं, बल्कि सभ्य समाज की पहचान है।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों में अनुशासन, कृतज्ञता, राष्ट्रभक्ति, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना विकसित करने का प्रयास करता है। शिक्षा केवल दिमाग को प्रशिक्षित करने का नाम नहीं है, बल्कि मन और चरित्र को भी गढ़ने की प्रक्रिया है। जो समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, वह भविष्य में अपनी पहचान भी खो देता है। इसलिए इस निर्णय को राजनीति और वैचारिक पूर्वाग्रह के चश्मे से देखने के बजाय भारतीय शिक्षा और संस्कृति के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। विज्ञान हमें आगे बढ़ने की शक्ति देता है, जबकि संस्कृति हमें यह याद दिलाती है कि हम कौन हैं। दोनों का संतुलन ही एक सशक्त, आत्मविश्वासी और विकसित भारत की नींव बन सकता है। छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया विष्णुदेव साय और शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने इसी दिशा में एक सार्थक कदम उठाया है, जिसका स्वागत होना चाहिए।