कोलकाता। पश्चिम बंगाल की सियासत में इन दिनों भारी उथल-पुथल मची हुई है। राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद अब ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो टुकड़ों में बंटने की अटकलें तेज हो गई हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बंगाल में भी ‘महाराष्ट्र मॉडल’ दोहराया जा सकता है, जहां करीब 50 विधायक बगावत कर ‘असली तृणमूल कांग्रेस’ का दावा ठोक सकते हैं। इस सियासी संकट की शुरुआत पार्टी की एक बैठक के रजिस्टर में हुए ‘सिग्नेचर फर्जीवाड़े’ से हुई, जिसकी जांच अब सीआईडी (CID) कर रही है। सीआईडी ने इस मामले में टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को नोटिस भेजकर बैठक का मूल रजिस्टर भी तलब किया है।
इस विवाद के बीच पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर दो विधायकों-ऋतब्रत बंदोपाध्याय और संदीपान साहा- को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, जिसने असंतोष की आग को और भड़का दिया है। फूट की यह दरार तब खुलकर सामने आ गई जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट आवास पर बुलाई गई विधायकों की बेहद महत्वपूर्ण बैठक फ्लॉप साबित हुई। पार्टी के कुल 80 विधायकों में से केवल 20 विधायक ही वहां पहुंचे, जबकि 60 विधायकों ने बैठक से दूरी बनाए रखी।

इतनी बड़ी संख्या में विधायकों की अनुपस्थिति ने पार्टी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। चर्चा यहाँ तक है कि बागी गुट एक ऐसी नई तृणमूल कांग्रेस बनाने की फिराक में है, जिसमें ममता और अभिषेक बनर्जी की कोई भूमिका न हो। दूसरी तरफ, ममता बनर्जी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए बीजेपी पर पलटवार किया है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी डर और लालच की राजनीति कर रही है और केंद्रीय एजेंसियों व पुलिस के दम पर उनके विधायकों को धमकाया जा रहा है। बहरहाल, विधायकों के इस रुख से साफ है कि टीएमसी इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट से गुजर रही है।
