बेलागंज (गया)। बिहार के गया जिले में पटना-गया राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित बेलागंज का काली मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि द्वापरकालीन इतिहास और अटूट श्रद्धा का जीवंत केंद्र है। ‘मां विभुक्षा काली’ के नाम से विख्यात इस दरबार की महिमा इतनी निराली है कि, यहाँ आने वाला हर भक्त प्रसन्न मन और नई उम्मीद लेकर लौटता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास असुर राज वाणासुर की पुत्री उषा से जुड़ा है। कहा जाता है कि, खुदाई के दौरान माता की प्रतिमा प्राकट्य हुई थी, जिसे उषा ने इसी पावन स्थल पर स्थापित किया था। प्रतिमा की एक खास विशेषता यह है कि, माँ का पेट प्रदर्शित नहीं है, जिस कारण उन्हें ‘विभुक्षा काली’ (भूखी माता) कहा जाता है और भक्त बड़े ही लाड-प्यार से उन्हें भोग अर्पण करते हैं।

वैसे तो सालों भर यहाँ भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन शारदीय नवरात्र और दीपावली के दौरान यहाँ का नजारा दिव्य होता है। नवरात्र की अष्टमी की रात यहाँ सात्विक बलि दी जाती है और महानिशा पूजा का विशेष आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु पहुँचते हैं। मंदिर का व्यवस्थित विकास 1980 के दशक में तब शुरू हुआ जब एक सरकारी अधिकारी की मनोकामना पूर्ण हुई। आज स्थानीय समिति और प्रशासन के सहयोग से यह एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल बन चुका है। गया-पटना रेलखंड पर बेला स्टेशन से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर सुलभ परिवहन सुविधाओं से जुड़ा है, जिससे श्रद्धालुओं को आने-जाने में सुगमता होती है।

बेलागंज की यात्रा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। इसके आसपास पर्यटन के कई अनमोल रत्न छिपे हैं। पूर्व में 12 किलोमीटर दूर वाणावर की प्रसिद्ध नागार्जुन गुफाएं और बाबा सिद्धनाथ का मंदिर है, तो पश्चिम में बाबा कोटेश्वरनाथ धाम और सोइया घाट का कृत्रिम झरना पर्यटकों को लुभाता है। भगवान बुद्ध के अनुयायियों के लिए कौआडोल पहाड़ी की तलहटी में स्थित आठ फीट ऊंची बुद्ध प्रतिमा और अशोक कालीन बुद्ध विहार के अवशेष आकर्षण का केंद्र हैं। दर्शन के बाद यहाँ की प्रसिद्ध ‘खोवा की लाई’ का स्वाद चखना कोई नहीं भूलता, जो यहाँ की पहचान बन चुकी है। भक्ति, इतिहास और स्वाद का यह संगम बेलागंज को बिहार के पर्यटन मानचित्र पर विशेष स्थान दिलाता है।
