सनातन धर्म में शुभ मुहूर्त का बड़ा महत्व होता है। क्योंकि शुभ मुहूर्त में ब्रह्मांड में स्थित ग्रह-नक्षत्रों सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। यही वजह है कि सदियों से हर शुभ कार्य को आरंभ करने से पूर्व मुहूर्त देखने की परंपरा चली आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समूचे ब्रह्मांड में नियमित रूप से प्रवाहित हो रही ऊर्जा को ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थितियां प्रभावित करती हैं। शुभ मुहूर्त का आकलन ज्योतिष शास्त्र एवं आध्यात्मिक विधियों द्वारा किया जाता है। ताकि पूजा करने वालों को ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पूरा लाभ मिल सके। वैदिक ग्रंथों के अनुसार, एक मुहूर्त 48 मिनट या दो घड़ी का होता है। 24 घंटे में कुल 30 मुहूर्त होते हैं 15 दिन के और 15 रात्रि के। शुभ मुहूर्त को कई श्रेणियों में विभक्त किया गया है यथा सुबह 4 बजे से 5.30 बजे तक ब्रह्म मुहूर्त का यह समय ध्यान, साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए बेहतर होता है, दोपहर के आसपास का अभिजीत मुहूर्त दैनिक पूजा के लिए उत्तम होता है, करीब 3 बजे से 5 बजे के बीच का अमृत मुहूर्त व्यापार, शिक्षा, साक्षात्कार या खरीदारी के लिए एवं ध्यान, योग और साधना के लिए सर्वोच्च माना गया है। यह दिन-रात के चौघड़िया का सबसे उत्तम और फलदायी मुहूर्त होता है, संध्याकालीन गोधूलि मुहूर्त आरती एवं दीप प्रज्वलन के लिए तथा दोपहर को खास समय पर किसी विशेष लक्ष्य हेतु विजया मुहूर्त में अस्त्रों एवं शस्त्रों की पूजा करना शुभफलदायक माना जाता है। गलत समय पर किए गए अनुष्ठान एवं मंत्रोच्चार से अशुभ एवं प्रतिकूल प्रभावों एवं दोषों का सामना करना पड़ता है। मुहूर्त के गलत चयन के नुकसान कई बार लंबे समय तक भुगतने पड़ते हैं। बिना सोचे-समझे शुरू किए गए कार्यों में अक्सर धन की हानि और मानसिक अशांति देखी जाती है। सही समय पर, ठीक मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा पाठ करने पर शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है किसी भी नए काम की शुरुआत राहु काल के दौरान नहीं करनी चाहिए। प्रतिदिन ग्रह-स्थिति और सूर्योदय के समय के अनुसार शुभ मुहूर्त बदलते रहते हैं। शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दोपहर 12.00 बजे के बाद नई पूजा या अनुष्ठान शुरू नहीं करना चाहिए क्योंकि दोपहर 12.00 से 4.00 बजे का समय देवी-देवताओं के विश्राम का समय होता है। यदि पूजा करते हुए दोपहर हो जाए तो उसे बुरा नहीं माना जाता। इसी तरह शाम की आरती के बाद भी पूजा या अनुष्ठान नहीं करना चाहिए। ज्योतिष के अनुसार, यदि हम सही समय पर कार्य शुरू करते हैं, तो बाधाएं कम आती हैं। मुहूर्त की गणना पंचांग के पांच अंगों -तिथि, नक्षत्र, वार, योग और करण पर आधारित होती है। तिथि के आधे हिस्से को करण कहते हैं ज्योतिष में माना गया है- यद् भावो आरम्भः, तद् भावो सिद्धिः अर्थात जैसा आरंभ होगा, वैसा ही परिणाम होगा। यदि कार्य शुभ समय में शुरू किया जाए तो उसका परिणाम भी अनुकूल होने की संभावना अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर मुहूर्त के बिना विवाह करने से वैवाहिक जीवन में तालमेल की कमी और कलह बढ़ना, राहुकाल या खराब समय में निवेश करने से भारी आर्थिक क्षति का होना एवं सही समय के अभाव में बनते हुए काम का अंत समय में बिगड़ जाने को कभी भी देखा जा सकता है। दोषों से बचने के लिए जरूरी है कि उस समय पर पूजा पाठ या अनुष्ठान न करें जो अशुभ माने गए हैं जैसे राहुकाल, गुलिक काल, यमगंड, भद्रा काल आदि। ग्रंथों में मुहूर्त के संबंध में कहा गया है कि शुभे मुहूर्ते कृतं कर्म शुभफलप्रदं भवेत् अर्थात शुभ मुहूर्त यानी अच्छे या अनुकूल समय में किया गया कार्य हमेशा शुभ और कल्याणकारी फल देने वाला होता है। नियमित पूजा पाठ करने वालों को भी प्रायः दुखी इसलिए देखा जाता है कि वे ईश्वर के प्रति आस्था, श्रद्धा एवं भक्ति की भावना तो रखते हैं लेकिन विधि -विधान से न पूजा करते हैं, न ही उचित मुहूर्त का ध्यान रखते हैं, न ही किसी की बात मानते हैं। हर पूजा,अनुष्ठान एवं रस्म अदायगी से पूर्व यदि स्वयं को ज्ञान नहीं है तो किसी जानकार से संपर्क अवश्य कर लेना चाहिए ताकि प्रतिकूल प्रभावों का सामना न करना पड़े।
मुहूर्त का महत्त्व- डॉ. माणिक विश्वकर्मा
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