छोटा-मोटा अफसर होना भी गुरूर करने के लिए पर्याप्त होता है। बहुत से युवा प्रारम्भिक काल में सिर्फ इसीलिए गंभीर होकर मेहनत करते हैं और फिर अफसर बन जाते हैं, कि उन्हें पता है, अफसर बन जाने के बाद वे एक तरह के राजा बन जाएंगे। और होता भी ऐसा है। अपने समय के सीधे-साधे युवा अफसर बनने के बाद जिस तरह की अभद्र हरकतें करते हैं, उसे देखकर यही मुहावरा याद आता है ‘प्यादे से फर्जी भये, टेढ़ा टेढ़ा जाएÓ। 25 साल का युवा अफसर 50 वर्ष के अधीनस्थ से तू-तडाक की भाषा में बात करता है,उसे गालियां भी देता है। पिछले दिनों बलरामपुर के कुसमी क्षेत्र (छत्तीसगढ़ )में घटी घटना अफसरियत का नंगा नाच नहीं तो और क्या कही जाए,जब एक एसडीएम ने एक ग्रामीण की इतनी पिटाई की कि उसकी जान ही चली गई! यह अफसर कुछ समय पहले रिश्वतखोरी के आरोप में गिरफ्तार भी हुआ था। लेकिन वाह रे हमारा सरकारी तंत्र कि रिश्वतखोर अफसर को फिर से मोर्चे पर तैनात कर दिया। और अब वह लोगों की निर्मम पिटाई कर रहा है! एक बुजुर्ग ग्रामीण बेचारा तो मर गया, दो अन्य ग्रामीण पूरी तरह घायल हुए। ये लोग अपने हक़ के लिए आंदोलन कर रहे थे। न्याय तो यही कहता है कि अफसर को लंबी सजा मिलनी चाहिए,लेकिन शायद ऐसा होगा नहीं। मेरे जैसे अनेक लोगों ने लंबे सामाजिक जीवन में यह अनुभव किया है कि बड़े-बड़े अफसर गंभीर अपराध करने के बावजूद अंतत: छूट जाते हैं। और फिर पदस्थ होकर मलाई खाते हैं।आखिर यह कैसा न्याय है कि अपराध करने के बावजूद अनेक अफसर को कड़ा दंड नहीं मिल पाता! क्या सिर्फ इसलिए कि वह अफसर होता है? लोकतंत्र में अफसरों की व्यवस्था दमन करने के लिए नहीं की गई थी, लोकतंत्र में सुचारू रूप से व्यवस्था चले इसलिए अफसर तंत्र की स्थापना की गई थी। लेकिन अनेक अफसर अब लोकतंत्र के लिए किसी भस्मासुर से कम साबित नहीं हो रहे । आए दिन ऐसी घटनाएं हम देखते-सुनते रहते हैं, जब अफसर आम लोगों से अभद्रता करते हैं, उनसे मारपीट करते हैं, उनका दमन करते हैं। ऐसी मारपीट को देखकर जो राजनीतिक लोग विपक्ष में हैं, वे इसे प्रशासनिक आतंकवाद कहते हैं, लेकिन जब यही नेता सत्तासीन हो जाते हैं, तो इसी प्रशासनिक आतंकवाद को बढ़ावा देते हैं। इसलिए मैं राजनीति को भी दोषी मानता हूँ कि वह प्रशासन पर गंभीरता के साथ अंकुश नहीं लगा पाती। किसी भी नागरिक के साथ मारपीट की हर घटना को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए और दोषी पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। बलरामपुर में हुई घटना के दोषी एसडीएम की गिरफ्तारी तो हुई है लेकिन उसे तुरंत जेल भेजना चाहिए। निलंबित भी करना चाहिए। और अगला चरण है उसकी बर्खास्तगी। समाज में कुछ ऐसे दृष्टांत तो पेश करें, जिसे देखकर लोगों को संतोष हो। लोग कहें कि अभी भी लोकतंत्र में न्याय व्यवस्था जिंदा है। वरना तो हम यही देखते आ रहे हैं कि दोषी अफसर बहुत जल्दी बहाल कर दिए जाते हैं। चाहे वह करोड़ों का गबन करें या किसी महिला के साथ दुराचार करें। अंतत: इनका बाल बांका नहीं होता। और ऐसे अनेक पापी शान के साथ पूरा जीवन जीने के बाद सेवानिवृत हो जाते हैं।और कभी-कभी तो सेवानिवृत्ति के बाद भी इन्हें प्रतिनियुक्ति पा जाते हैं। चाटुकारिता के बल पर। अजीब किस्म का है हमारा सिस्टम। अब देखना यही है कि उक्त हत्यारे एसडीएम को कितनी बड़ी सजा मिलती है। सजा मिलती भी है या कोई जांच आयोग बिठाकर मामले को लंबा खींचा जाएगा।
अफसर होने का गुरूर! – गिरीश पंकज
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