महान यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने कहा है कि जो सबका मित्र है वह किसी का मित्र नहीं होता। यह एक ऐसा गूढ़ और शाश्वत विचार है जो सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत जीवन के हर पहलू में गहराई से लागू होता है। क्योंकि सच्ची मित्रता विश्वास, परस्पर सम्मान, गहराई, वफादारी और निःस्वार्थ स्नेह जैसे बुनियादी स्तंभों पर टिकी होती है। प्रेम और प्रतिबद्धता में अनन्यता का बहुत महत्व है। यदि कोई निष्ठा या समर्पण सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध है, तो उसका विशेष मूल्य समाप्त हो जाता है। विशेष होने का अहसास तभी आता है जब उसमें एक सीमा और समर्पण हो। असल में सबको अपना मित्र दर्शाने वाले सबसे मन से किसी से भी जुड़ा नहीं रहता। हमेशा कपड़ों की तरह अच्छा दिखने एवं बने रहने के लिए मित्र बदलते रहता है। सिर्फ मित्र होने का दिखावा कर रहा होता है। उसका जुड़ाव किसी के प्रति भी वफादार नहीं होता। मित्रता का संबंध सदैव हृदय एवं भावनाओं से होता है और हम अपनी भावनाओं का एकत्व उन्हीं से स्थापित कर पाते हैं जितनी चेतना हमारी चेतना से प्रतिध्वनित या अनुनादित होती है। यही वजह है कि मित्र तो अनेक होते हैं लेकिन घनिष्ठता कुछ ही लोगों से हो पाती है। समस्त सृष्टि के साथ एकत्व साधने वाले संत, महात्मा, योगी या देवपुरुष ही सबके अपना मित्र घोषित कर सकते हैं क्योंकि वे आत्मिक-स्तर पर पूरी सृष्टि के साथ एकत्व साध चुके होते हैं लेकिन यदि कोई सांसारिक व्यक्ति सबको अपना मित्र घोषित करता है तो यह उसके कई लोगों से किसी न किसी रूप में स्वार्थ वश जुड़े होने को उजागर करता है। मिलनसार एवं व्यवहारकुशल होना का गुण महज अभिव्यक्ति से जुड़ा होता है जो लोकप्रिय होने और सांसारिक उद्देश्यों को पूरे करने के आवश्यक होता है जबकि मित्रता भावनाओं के आयामों अर्थात मनोभावों की एकनिष्ठता से जुड़ा होता है। इसीलिए प्रायः ऐसे बुद्धिजीवी जो भावनाओं में नहीं बहते वे मित्र तो बनाते हैं लेकिन भावनात्मक रूप से किसी के मित्र नहीं बन पाते। केवल सतही एवं स्वार्थमयी मानसिक संबंध बनाए रखते हैं। शवे मन से किसी के मित्र नहीं बन पाते। मेरे मुंह पर तेरे और मेरे मुंह पर मेरे या तू मेरा चाँद मैं तेरी चाँदनी के सिद्धांत पर चलने वाले लोगों से सदैव बचकर रहना चाहिए जो सभी का है, वह किसी का नहीं केवल एक कहावत नहीं है, बल्कि यह मानव स्वभाव और सामाजिक व्यवस्था का एक कड़वा सच है। चाहे कोई भी रिश्ता हो या मित्रता हर किसी का बनने की तुलना में कुछ खास रिश्तों में ईमानदारी और गहराई से जुड़ना अधिक अर्थपूर्ण एवं सार्थक माना जाता है। सच्ची मित्रता केवल पहचान, औपचारिकता या मीठी बातों तक सीमित नहीं होती। इसके लिए समय, ध्यान, समर्पण और भावनात्मक गहराई की आवश्यकता होती है। जब कोई व्यक्ति हर किसी के साथ समान रूप से निकटता दिखाने का दावा करता है, तो उसके संबंध केवल सतही रह जाते हैं। सच्चे मित्र संकट और कठिन परिस्थितियों में एक- दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। यदि कोई व्यक्ति सभी का मित्र बनने का प्रयास करता है, तो हितों के टकराव के समय वह किसी एक के प्रति निष्ठावान नहीं रह पाता। निष्पक्ष रहने के चक्कर में वह अंततः किसी का भी वास्तविक सहारा नहीं बन पाता। किसी भी व्यक्ति के पास मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा सीमित होती है। कोई भी अपना समय और विश्वास कुछ ही लोगों के साथ गहराई से साझा कर सकते हैं। जब यह ऊर्जा सैकड़ों लोगों में बाँट दी जाती है, तो किसी एक के लिए भी पर्याप्त ध्यान नहीं बचता। जो व्यक्ति सभी को खुश करने और सभी का प्रिय बनने की कोशिश करता है, उसे अक्सर अपने विचार, मूल्य और सीमाएँ बदलनी पड़ती हैं। ऐसा करने से उसकी अपनी कोई स्पष्ट पहचान नहीं रह जाती। राजनीति का क्षेत्र हो या कला, साहित्य या संगीत का हर जगह मतलबपरस्त मित्रों एवं शुभचिंतकों की संख्या में तेजी से इजाफ़ा हो रहा है। ये मानवीय संबंधों के लिए अच्छा संकेत नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो सच्ची मित्रता सौहार्दपूर्ण संबंध संख्या पर नहीं, बल्कि गुणवत्ता पर निर्भर करती है। दर्जनों सतही मित्रों एवं शुभचिंतकों रूपी तुलना में एक या दो सच्चे और भरोसेमंद मित्र एवं शुभचिंतक का होना कहीं अधिक मूल्यवान है।
जो सभी का है वो किसी का नहीं-डॉ. माणिक विश्वकर्मा
Follow Us
