उत्तर प्रदेश में, जिसे भाजपा की हिंदूत्व की प्रयोगशाला माना जाता है, विधान परिषद के चुनाव को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल माना जा रहा था। सभी की निगाहें खास तौर पर दो स्थानों पर थीं- वाराणसी और गोरखपुर। जिन चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए चुनाव हुए, वे हैं उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक। मतदान 23 अक्टूबर को हुआ तथा मतगणना 27 अक्टूबर को शुरू हुई। मीडिया की खबरों के अनुसार, देर शाम तक उत्तर प्रदेश की 11 सीटों में से आठ सीटों पर परिणाम आ चुके थे। इनमें से पांच सीटों पर भाजपा और तीन पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की थी। जिन तीन सीटों पर मतगणना चल रही थी, उनमें से दो पर समाजवादी पार्टी और एक पर भाजपा आगे थी। यदि यह रुझान यथावत बना रहता है, तो भाजपा के हिस्से में छह और समाजवादी पार्टी के हिस्से में पांच सीटें आएंगी। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में, जब समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में पिछले दस वर्षों से सत्ता से बाहर है, उसके द्वारा 11 में से पांच सीटें जीतने का परिणाम भाजपा के लिए किसी दु:स्वप्न से कम नहीं होगा। इन आंकड़ों से भी बड़ा झटका भाजपा के लिए वाराणसी शिक्षक और वाराणसी स्नातक सीटों पर हार है। वैसे, निर्वाचन क्षेत्र के हिसाब से देखा जाए तो विधान परिषद के चुनाव में वाराणसी सीट के अंतर्गत सात अन्य जिले भी आते हैं- चंदौली, जौनपुर, गाजीपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही और बलिया। लेकिन चूंकि वाराणसी लोकसभा सीट के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, इसलिए चुनावी दृष्टि से इस सीट का नाम ही काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। इस चुनाव पर सभी की निगाहें इसलिए भी थीं, क्योंकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी सीट पर काफी उलटफेर देखने को मिला था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जीत का अंतर वर्ष 2019 के मुकाबले घटकर लगभग डेढ़ लाख रह गया था, जबकि 2019 में वे 4.79 लाख मतों से विजयी हुए थे। वर्ष 2019 में उनकी जीत का अंतर 2014 के मुकाबले एक लाख से अधिक रुक गया था। गोरखपुर में भाजपा प्रत्याशी और निर्दलीय उम्मीदवार के बीच कांटे की टक्कर थी। अंतिम खबर मिलने तक भाजपा प्रत्याशी ध्रुव त्रिपाठी आगे चल रहे थे। इसलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर में यदि भाजपा जीतती है, तो यह भाजपा के लिए राहत की बात होगी। यह वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव ही था, जब भाजपा के 400 पार के नारे पर उत्तर प्रदेश ने ब्रेक लगा दिया था। इसके बाद लोकसभा में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई थी। वर्ष 2019 में उत्तर प्रदेश की कुल 80 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 62 पर जीत हासिल की थी, जबकि वर्ष 2024 में यह संख्या घटकर 33 रह गई। यदि भाजपा को लोक सभा चुनावों में सबसे बड़ा झटका अयोध्या में लगा था, जहां राम मंदिर बनने के बाद पहले ही लोकसभा चुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा, तो वाराणसी की विधान परिषद सीटों पर भाजपा की हार को भी विपक्ष भाजपा के हिंदुत्व की घटती धार के रूप में देख सकता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद, खासकर ज्ञानेश कुमार के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने के बाद, मतदाता सूचियों और अन्य कथित धांधलियों को लेकर केंद्रीय निर्वाचन आयोग तथा भाजपा दोनों ही विपक्ष और कॉग्रेस अध्यक्ष खड़गे के लगातार निशाने पर हैं। विधान परिषद के चुनावों में भी विपक्ष ने निर्वाचन आयोग के समक्ष मतदाता सूचियों में गड़बड़ियों को लेकर आरोप लगाए। विधान परिषद के चुनाव मतपत्रों के माध्यम से हुए थे। विपक्ष लंबे समय से मतपत्रों के माध्यम से चुनाव कराने की मांग करता रहा है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस कर्नाटक में, जहां उसकी सरकार है, चारों सीटों पर भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) के गठबंधन के सामने हार गई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के लिए भी ये चुनाव परिणाम किसी सदमे से कम नहीं हैं। डीके शिवकुमार को कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को हटाकर मुख्यमंत्री बनाया जाना था। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस को सफलता नहीं मिली, जहां सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों को मिली-जुली सफलता हासिल हुई। बिहार में भाजपा, राष्ट्रीय जनता दल, जन सुराज पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड) और निर्दलीय प्रत्याशियों की जीत का बहुत ही खबरें सामने आ रही हैं। कुल मिलाकर, भाजपा के लिए ये चुनाव आगामी विधानसभा चुनावों से पहले वास्तविकता का आकलन करने का अवसर साबित होंगे। पार्टी अपने संगठन को और मजबूत करने की कोशिश करेगी। वहीं, कांग्रेस के लिए ये चुनाव एक बड़ा संदेश हैं कि उसके पास भले ही कितने बड़े मुद्दे हों, लेकिन यदि वह संगठन के स्तर पर खुद को मजबूत नहीं करती, तो आने वाले समय में भी उसे निराशा ही हाथ लगेगी।
विधान परिषद चुनाव: काशी की हार भाजपा के लिए सदमा, कांग्रेस भी पस्त- रंजन श्रीवास्तव
Follow Us
