अलविदा आशा ताई – संजय सक्सेना

Follow Us

भारतीय संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल और दिग्गज गायिका आशा भौसले के रूप में सिनेमा उद्योग ही नहीं भारत ने एक और अनमोल रत्न खो दिया। आशा भौसले का 92 साल की उम्र में निधन हो गया। लोग प्यार से उन्हें आशा ताई कहते थे। इसे संयोग ही. कहा जायेगा कि बड़ी बहन स्वर कोकिला लता मंगेशकर के निधन के चार साल बाद उनका निधन हुआ, वह भी 92 वर्ष कि आयु में दिवंगत हुईं थीं। आशा ताई ने 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना गाया और 82 साल तक गाती रहीं। 12 हजार से ज्यादा गाने गाकर गिनीज वल्र्ड रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज कराया। शास्त्रीय संगीत से लेकर कैबरे, पॉप, जैज और गजल तक, हर विधा में उन्होंने अपनी महारत साबित की। आशा जी बचपन में खेल-कूद और खाने-पीने की शौकीन थीं, खासकर दूध-मलाई उनकी कमजोरी थी। गायिकी के दौरान बड़ी बहन लता मंगेशकर के साथ उनके रिश्ते खास थे। उन्होंने बताया था कि जब वे दीदी के साथ मन क्यों बहका गाना गाती थीं, तो एक-दूसरे की नजरों को देखकर लाइन उठाती थीं। उन्हें हमेशा लगता था कि दीदी के सामने उनकी गायिकी कम न पड़े। 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा भोसले का बचपन बेहद तंगहाली में बीता। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक रंगमंच कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। घर में संगीत का माहौल तो था, लेकिन आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। गरीबी का आलम यह था कि फीस न होने के चलते उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। बचपन का एक भावुक किस्सा है कि बड़ी बहन लता मंगेशकर जब स्कूल जाती थीं, तो वे आशा को चोरी-छिपे अपने साथ ले जाकर क्लास में बैठा लेती थीं। मास्टरजी से छिपकर दो दिन तो पढ़ाई चली, लेकिन तीसरे दिन पकड़ी गईं। मास्टरजी ने साफ कह दिया कि एक फीस में एक ही बच्चा पढ़ सकता है और दोनों को बाहर कर दिया। उस दिन लता ने फैसला किया कि वह खुद नहीं पढ़ेंगी बल्कि छोटी बहन को पढ़ाएंगी। उन्होंने अपना नाम कटवाकर आशा का एडमिशन कराया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

जब आशा महज 9 साल की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। परिवार पर अचानक आर्थिक संकट का पहाड़ टूट पड़ा। तब बड़ी बहन लता ने जिम्मेदारी संभाली और मंगेशकर परिवार पुणे से मुंबई आकर बस गया। परिवार को सहारा देने के लिए लता और आशा दोनों ने ही कम उम्र में फिल्मों में गाना और छोटी भूमिकाएं करना शुरू कर दिया। आशा भोसले ने 9 फिल्मफेयर जीते, जिनमें 7 बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर अवॉर्ड शामिल हैं। आशा को 100 से ज्यादा प्रतिष्ठित अवॉर्ड्स मिले, कुल 18 बार फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। उनका आखिरी गाना 2026 में रिलीज हुआ। आशा ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 1943 में मराठी फिल्म माझा बाळ के गाने ‘चला चला नव बाड़ाÓ से की थी। इसके बाद उन्हें 1948 में 15 साल की उम्र में हिंदी फिल्म चुनरिया का गाना सावन आया मिला। उस दौर में नूर जहां, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी बड़ी गायिकाओं का दबदबा था। आशा को केवल वही गाने मिलते थे जिन्हें बड़ी सिंगर्स या तो छोड़ देती थीं या उनकी फीस फिल्ममेकर्स नहीं दे पाते थे। आशा की निजी जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही। 16 साल की उम्र में उन्हें अपनी बड़ी बहन लता के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से प्यार हो गया, जो उम्र में उनसे 15 साल बड़े थे। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने घर से भागकर शादी कर ली। इस फैसले से मंगेशकर परिवार और खासकर लता दीदी से उनके रिश्ते बिगड़ गए। ससुराल में आशा को पति और ससुराल वालों के खराब व्यवहार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा। 1960 में, जब आशा दो बच्चों के साथ थीं और तीसरे बच्चे की मां बनने वाली थीं, गणपत राव ने उन्हें घर से निकाल दिया। मजबूरी में उन्हें अपने मायके लौटना पड़ा। इस कठिन समय में भी उन्होंने हार नहीं मानी और अपने बच्चों की परवरिश के लिए गायकी को ही अपना हथियार बनाया। 1950 के दशक में संगीतकार ओपी नैयर ने आशा भोसले की आवाज की उस खनक को पहचाना जिसे दुनिया खराब समझ रही थी। नैयर साहब ने ही पहली बार उनकी आवाज के वेस्टर्न मॉड्यूलेशन का सही इस्तेमाल किया। 1954 में मंगू से शुरू हुआ उनका सफर 1957 में फिल्म नया दौर के साथ शिखर पर पहुंच गया।

उड़े जब जब जुल्फें तेरी और मांग के साथ तुम्हारा जैसे गानों ने आशा को सुपरस्टार बना दिया। नैयर साहब ने कसम खाई थी कि वे केवल आशा के साथ काम करेंगे और कभी लता मंगेशकर की ओर रुख नहीं करेंगे। उन्होंने आशा के लिए 324 गाने बनाए, जिनमें हावड़ा ब्रिज का आइए मेहरबां जैसा कल्ट क्लासिक शामिल है। इन्हीं गानों ने आशा को लता के साये से निकलकर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में मदद की। 1960 और 70 के दशक में आरडी बर्मन के साथ आशा भोसले की जोड़ी ने भारतीय संगीत में क्रांति ला दी। पंचम दा ने आशा की आवाज को कैबरे, जैज और रॉक संगीत के लिए तराशा। दम मारो दम (हरे रामा हरे कृष्णा) और पिया तू अब तो आजा (कारवां) जैसे गानों ने आशा को क्वीन ऑफ इंडिपॉप की उपाधि दिलाई। जब दुनिया को लगने लगा था कि आशा केवल चुलबुले या कैबरे गाने ही गा सकती हैं, तब 1981 में फिल्म उमराव जान आई। संगीतकार खय्याम के निर्देशन में उन्होंने दिल चीज क्या है और इन आंखों की मस्ती के जैसी गजलें गाकर साबित कर दिया कि वे शास्त्रीय गायन में भी लता मंगेशकर के बराबर खड़ी हैं। फिल्म बंदिनी का गाना अब के बरस भेज भैया, औरतों के दर्द को बयां करता गाना है। आशा जी ने बताया था कि इस गाने की रिकॉर्डिंग के दौरान उन्हें अपने भाई की इतनी याद आई कि वे रो पड़ीं। उन्होंने रोते हुए ही इस गाने को सिर्फ एक टेक में रिकॉर्ड कर दिया था। वहीं, उनके मशहूर गाने दम मारो दम को रेडियो और टीवी पर बैन कर दिया गया था, लेकिन इसी गाने के लिए उन्हें बेस्ट प्लेबैक सिंगर का अवॉर्ड मिला। आज आशा ताई नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज और उनके गानों के दीवाने हजारों नहीं, करोड़ों हैं और रहेंगे। उनकी आवाज अमर रहेगी। सादर श्रद्धांजलि।