बेसहारा बाजार, उम्मीदें तार-तार: संजय सक्सेना

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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के चलते केवल भारतीय बाजार ही नहीं, पूरी दुनिया का बाजार जैसे बेसहारा हो गया है। अनिश्चितता के चलते बाजार के निवेशकों का मनोबल लगातार गिरा है। इससे भारतीय शेयर बाजारों में लगातार बिकवाली का दबाव बना रहा। यही कारण है कि बीते सप्ताह बाजार में भारी उतरा-चढ़ाव और गिरावट देखने को मिली और आज भी यही सिलसिला चलता दिखाई दे रहा है। निफ्टी और सेंसेक्स की चाल को देखते हुए इस सप्ताह भी बाजार की दिशा में भारी उतार-चढ़ाव रहने की संभावना है। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष से जुड़े घटनाक्रम होंगे। फिलहाल अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध खत्म होता नहीं दिख रहा है, उलटे तेज हमले होने की आशंकाएं बलवती होती जा रही है। तेल भंडार और रिफायनरी को निशाना बनाया जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि कच्चे तेल की कीमतों के रुझान, वैश्विक बॉन्ड यील्ड और मुद्रा बाजार की अस्थिरता को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, क्योंकि आज भी यही हो रहा है। जंग के हालात ने बाजारों को प्रभावित किया है। यह एक अप्रत्याशित घटना थी और उम्मीदों के विपरीत, यह एक लंबा संघर्ष बनता जा रहा है, जिसके समाप्त होने के फिलहाल तो कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस घटना ने पश्चिम एशिया की अर्थव्यवस्थाओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है और अब ऊर्जा अवसंरचना भी इससे प्रभावित हो रही है। भारत पहले से ही अपनी आर्थिक विकास दर में मंदी और भारतीय आईटी पर एआई के प्रभाव से जूझ रहा था, और इस संघर्ष ने एक प्रमुख आर्थिक कारक तेल पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। इसलिए बाजार में गिरावट कोई आश्चर्य की बात नहीं है और संघर्ष के परिणाम के आधार पर और गिरावट की संभावना है। इस बीच होर्मुज जलडमरू मध्य मार्ग प्रभावित होने के कारण तेल व गैस की सप्लाई ने सामान्य जीवन पर भी असर डाला है। वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा, जिस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, उसमें गंभीर व्यवधान उत्पन्न होने से चिंताएं और भी बढ़ गईं हैं। सुरक्षा जोखिमों में वृद्धि और युद्ध के जोखिमों से बीमा प्रीमियम में उछाल के कारण कई शिपिंग ऑपरेटरों ने इस रास्ते से आवाजाही बंद कर दी है। इससे टैंकरों का आनाजाना प्रभावी रूप से बाधित हो रहा है और आपूर्ति में लंबे समय तक व्यवधान की आशंका बढ़ गई। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न अनिश्चितता ने कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया बाजार में एक नया भू-राजनीतिक जोखिम पैदा कर दिया है। विशेष मानते हैं कि पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसलिए बढ़ते संघर्ष ने आपूर्ति में निरंतर व्यवधान, मुद्रास्फीति के दबाव और व्यापक मैक्रोइकॉनॉमिक अस्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक भारत के लिए, ऊर्जा की बढ़ी हुई कीमतों ने तत्काल मैक्रोइकॉनॉमिक दबाव बढ़ा दिया है। इससे रिफाइनर, तेल विपणन कंपनियों, परिवहन, बिजली, सीमेंट और अन्य ऊर्जा-संवेदनशील उद्योगों के लिए इनपुट लागत बढ़ गई है। विदेशी संस्थागत निवेशकों यानि एफआईआई) ने 13 मार्च 2026 तक 46,166.58 करोड़ रुपये की शुद्ध बिक्री की। इस सप्ताह भी यह संभावना बनी हुई है। असल में, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और आर्थिक राहत के लिए किसी भी तरह के उपाय नहीं किये जा रहे हैं, इससे वैश्विक शेयर बाजार तनाव में हैं। मैक्रो आर्थिक मोर्चे पर भी नई सीपीआई शृंखला पर आधारित फरवरी की सीपीआई मुद्रास्फीति 3.2 प्रतिशत वार्षिक पर लगातार बढ़ती रही। विदेशी निवेश निधि यानि एफपीआई प्रवाह में उतार-चढ़ाव जारी रहने की संभावना है। विदेशी संस्थागत निवेशकों कीे लगातार बिकवाली के विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों यानि डीआईआई ने 37,740 करोड़ रुपये के शेयर खरीदकर मजबूत समर्थन प्रदान किया। इसने बाजार को सहारा देने और मौजूदा बाहरी चुनौतियों के बीच बाजार की भावना को स्थिर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन यह काफी कम है। कुल मिलाकर बाजारों की अनिश्चितता ने जहां निवेशकों को हतोत्साहित किया है, वहीं लाखों लोगों को कर्ज के गर्त में भी धकेल दिया है। लोग बड़े घाटे में चले गए हैं। हालांकि उद्योग पर उतना असर फिलहाल इसलिए नहीं पड़ा है, क्योंकि शेयर बाजार की गिरावट का सीधा असर उन तक कम पहुंच पा रहा है। यदि यह सिलसिला आगे बढ़ा या तेज होता है, तो निश्चित तौर पर उद्योग-व्यवसाय प्रभावित होंगे, जो सीधे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे। उम्मीद की किरण जंग के बंद होने के बाद ही दिखेगी, अभी तो आशंकाओं का अंधेरा घना होता जा रहा है।