नई दिल्ली। भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026 को लेकर अमेरिका में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आई है। रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने सोशल मीडिया पर कहा कि प्रस्तावित संशोधन चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित कर सकते हैं। उन्होंने इसे ईसाई समुदाय के लिए चिंता का विषय बताते हुए कहा कि यदि बिल मौजूदा स्वरूप में पारित होता है, तो इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधनों का उद्देश्य विदेशी फंडिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार के अनुसार, नए प्रावधानों से विदेशी धन के उपयोग पर बेहतर निगरानी और नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित होगा।
विवाद की सबसे बड़ी वजह यह आशंका है कि यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाए और उसका नवीनीकरण न हो, तो उसके द्वारा संचालित स्कूल, अस्पताल या अन्य परिसंपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ सकता है। इसी कारण कई विपक्षी दल, एनजीओ और चर्च संगठन इस बिल का विरोध कर रहे हैं। खासकर केरल और मिजोरम जैसे राज्यों में, जहां बड़ी संख्या में ईसाई संस्थाएं शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं संचालित करती हैं, इस प्रस्ताव को लेकर चिंता जताई जा रही है। फिलहाल यह विधेयक संसद में चर्चा के दौर से गुजर रहा है और सभी पक्षों की नजर इसके अंतिम स्वरूप पर टिकी है।
