नई दिल्ली। हॉस्पिटैलिटी सेक्टर की कंपनियों OYO और Zostel के बीच पिछले आठ वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद में Zostel को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने OYO की पैरेंट कंपनी PRISM के खिलाफ Zostel की याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही अदालतों से राहत पाने की Zostel की लगातार नौवीं कोशिश भी असफल रही।
यह विवाद वर्ष 2018 से विभिन्न अदालतों में चल रहा है। Zostel ने गुरुग्राम जिला अदालत, दिल्ली हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की अपीलीय बेंच सहित कई मंचों पर कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन अब तक उसे किसी भी स्तर पर बड़ी राहत नहीं मिल सकी है।
Zostel का दावा है कि OYO के साथ हुई टर्म शीट और समझौते के आधार पर उसे कुछ अधिकार प्राप्त हैं। वहीं OYO का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच कोई अंतिम और बाध्यकारी समझौता नहीं हुआ था, इसलिए Zostel के दावे कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं।
इस मामले में मई 2025 में भी दिल्ली हाई कोर्ट ने Zostel के पक्ष में आए आर्बिट्रल अवार्ड (मध्यस्थता निर्णय) को रद्द कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि टर्म शीट की अधिकांश शर्तें बाध्यकारी नहीं थीं और महत्वपूर्ण व्यावसायिक शर्तों पर अंतिम सहमति नहीं बनी थी। ऐसे में किसी पक्ष को अनुबंध का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
ताजा फैसले के बाद OYO की पैरेंट कंपनी PRISM को बड़ी राहत मिली है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला स्पष्ट करता है कि केवल प्रारंभिक सहमति या टर्म शीट के आधार पर किसी व्यापारिक सौदे में अंतिम अधिकार तय नहीं किए जा सकते, जब तक कि सभी आवश्यक शर्तों के साथ औपचारिक अनुबंध न हो।
अब Zostel के पास आगे की कानूनी रणनीति तय करने का विकल्प है, जबकि OYO के लिए यह फैसला लंबे समय से चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण कानूनी जीत माना जा रहा है।
