वाशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वीजा नीति को अमेरिकी अदालत से एक और करारा झटका लगा है। बोस्टन की संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा H-1B वीजा पर लगाई गई 1 लाख डॉलर (करीब 83 लाख रुपये) की भारी-भरकम नई फीस को पूरी तरह गैरकानूनी बताते हुए रद्द कर दिया है। फेडरल कोर्ट के जज लियो सोरोकिन ने सोमवार को 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल द्वारा दायर याचिका पर यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वीजा के लिए इतनी बड़ी रकम वसूलना कोई सामान्य शुल्क नहीं बल्कि एक टैक्स की तरह है, जिसे लागू करने का अधिकार राष्ट्रपति को नहीं बल्कि केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है। जज ने कहा कि यह नीति ट्रंप के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इससे शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक क्षेत्रों को भारी नुकसान होगा।

अदालत के इस फैसले से आईटी प्रोफेशनल्स और खासकर भारतीय नागरिकों को बहुत बड़ी राहत मिली है। दरअसल, H-1B वीजा कुशल विदेशी पेशेवरों, विशेषकर भारतीयों के लिए अमेरिका में काम करने का सबसे बड़ा जरिया है। इसके तहत अमेरिकी कंपनियां टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और फाइनेंस जैसे क्षेत्रों में विदेशी दिग्गजों को नियुक्त करती हैं। हर साल अमेरिका द्वारा जारी किए जाने वाले कुल H-1B वीजा में से 70 फीसदी से अधिक हिस्सा भारतीय पेशेवरों के खाते में जाता है। इस कार्यक्रम के तहत सालाना 65,000 नियमित वीजा और उच्च शिक्षा प्राप्त वर्कर्स के लिए 20,000 अतिरिक्त वीजा जारी किए जाते हैं। हालांकि, व्हाइट हाउस की प्रवक्ता टेलर रोजर्स ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेगा और उन्हें उम्मीद है कि यह आदेश पलट जाएगा। फिलहाल कोर्ट के इस रुख से लाखों भारतीयों ने राहत की सांस ली है।
