15 नवंबर को देश जनजातीय गौरव दिवस मनाएगा। बिरसा मुंडा को याद किया जाएगा। आदिवासी समाज के गौरव और अधिकारों की बातें होंगी। सरकारी मंचों से जनजातीय समुदायों के विकास और कल्याण के दावे भी किए जाएंगे। लेकिन उसी दिन मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के करीब 30 से ज्यादा बैगा परिवार अपने उन बच्चों को याद कर रहे होंगे, जो पिछले कुछ महीनों में बीमार होने के बाद इस दुनिया से असमय चले गए। विडंबना यह है कि जब इन परिवारों के बच्चे पिछले कुछ महीनों में एक के बाद एक बीमार होकर मर रहे थे, उसी दौरान 9 अगस्त को पूरी दुनिया विश्व आदिवासी दिवस मना रही थी। सवाल यह नहीं है कि आदिवासियों के सम्मान में कितने आयोजन हुए। सवाल यह है कि जिन बच्चों के नाम पर सरकारें योजनाएं बनाती हैं अगर उसका क्रियान्वयन अगर सही तरीके से किया गया है तो ऐसी गंभीर स्थिति कैसे पैदा हो सकती है और बच्चों के बीमार या मरने की खबर उच्च अधिकारियों को समय पर क्यों नहीं मिलता जबकि ग्राम स्तर तक कई विभागों के निचले अमले की उपस्थिति रहती है? तो क्या यह नीचे का अमला वाकई फील्ड में रहता है यहाँ यह भी सवाल उठता है या अगर वह फील्ड में है तो क्या उनमें इतनी संवेदनशीलता नहीं है कि वे आदिवासी बहुल या किसी भी गांव में ऐसी गंभीर स्थिति उत्पन्न होने पर उसकी सूचना अपने उच्च अधिकारियों को दें? या कहीं ऐसा तो नहीं कि उच्च अधिकारियों तक सूचना पहुंची हो और उन्होंने उन सूचनाओं पर समय रहते कार्रवाई नहीं की? देश के उन आदिम जनजातीय समूहों को, जिन्हें क्कड्डह्म्ह्लद्बष्ह्वद्यड्डह्म्द्य4 ङ्कह्वद्यठ्ठद्गह्म्ड्डड्ढद्यद्ग ञ्जह्म्द्बड्ढड्डद्य त्रह्म्शह्वश्चह्य यानी विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह कहा गया, विशेष संरक्षण और सहायता की जरूरत है। मध्य प्रदेश में ऐसे तीन समूह हैं — बैगा, भारिया और सहरिया। ऐसे में बैगा बच्चों की लगातार मौतें उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है, जिसका पहला दायित्व सबसे कमजोर लोगों और खासकर बच्चों की जिंदगी की रक्षा करना है। अभी तक प्रशासन ने मृतक बच्चों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक नहीं किया है। हालांकि, स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 30 से ज्यादा बैगा बच्चों की मौत हुई है। बालाघाट जिले के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह ने समीक्षा बैठक के बाद 28 मौतों का जिक्र किया। मौतों की वास्तविक संख्या क्या है, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट होगा। लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी संख्या में बच्चों की मौत होने तक प्रशासन को इसकी गंभीरता का अहसास क्यों नहीं हुआ। प्रशासन ने अभी यह भी स्पष्ट नहीं किया है कि बच्चों की मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण क्या था। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मौत से पहले कई बच्चों में बुखार, त्वचा संक्रमण और दस्त जैसे लक्षण दिखाई दिए थे। मलेरिया, साफ पानी की कमी और कुपोषण को भी मौतों के पीछे संभावित कारणों के तौर पर बताया जा रहा है।बताया जाता है कि बालाघाट के बिरसा और बैहर ब्लॉक के कई गांवों से बच्चों के बीमार पडऩे और उनमें से कुछ की मौत की खबरें जून से ही आने लगी थीं। लेकिन प्रशासन तब सक्रिय हुआ, जब अगस्त में मौतों की संख्या में असामान्य वृद्धि सामने आई।आदिवासी इलाकों में कुपोषण पहले से ही एक गंभीर चुनौती है। कुपोषित बच्चे बीमारी से लडऩे में कमजोर होते हैं। ऐसे में मलेरिया हो या कोई अन्य संक्रमण, बीमारी उनके लिए कहीं ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है। अब सरकारी अधिकारियों और उनकी गाडिय़ों का रुख प्रभावित गांवों की ओर है। बैठकें हो रही हैं। समीक्षा हो रही है। निर्देश दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जिले का दौरा कर स्थानीय स्तर पर स्थिति को सुधारने के लिए कई निर्देश दिए।जिले के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह ने लगभग 10 दिन पहले अधिकारियों की बैठक ली।स्थानीय मीडिया के अनुसार, जून के आखिरी सप्ताह से बैहर और बिरसा ब्लॉक के दर्जनों बैगा बहुल गांवों — सोनगुड्डा, बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, मछूलदा, मातला, गठिया आदि — से बच्चों के बीमार पडऩे और मरने की खबरें आने लगी थीं। शुरुआती सरकारी आंकड़ा सिर्फ 8 मौतों का था। लेकिन गांव-गांव जाकर की गई पड़ताल में संख्या इससे कहीं ज्यादा सामने आई।मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अडोरी पंचायत के सरपंच परशुराम धुर्वे ने दावा किया, अकेले मेरी पंचायत में 9 बच्चों की मौत हो चुकी है। एक पंचायत में नौ बच्चों की मौत का दावा किसी भी संवेदनशील प्रशासन के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए। इसलिए इस पूरे मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच जरूरी है। जांच सिर्फ यह पता लगाने के लिए नहीं कि बच्चों की मौत किस बीमारी से हुई। जांच यह भी तय करे कि बीमारी की शुरुआती सूचना कब मिली? किस अधिकारी को मिली? किसी अधिकारी और कर्मचारी की अगर कोई लापरवाही मिली तो उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? इलाज और दवाइयों की क्या व्यवस्था की गई? कुपोषण और साफ पानी की स्थिति क्या थी और उसको ठीक करने के लिए त्वरित कार्रवाई क्या की गई?
जमीनी हकीकत: नवंबर में जनजातीय गौरव दिवस, 30 बैगा परिवारों में मातम-रंजन श्रीवास्तव
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