बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी का लंबे समय तक अलग रहना अपने आप में तलाक का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है। अदालत ने पति की अपील खारिज करते हुए पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता या परित्याग जैसे आधारों पर तलाक लेने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करना जरूरी है। केवल वैवाहिक संबंधों में दरार आने या लंबे समय तक अलग रहने से विवाह-विच्छेद की अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सुषमा सावंत की खंडपीठ ने राजनांदगांव निवासी रोहित रजक की अपील पर सुनवाई की। पति ने आरोप लगाया था कि उसकी पत्नी संतोषी रजक 25 अक्टूबर 2010 को सरकारी आवास छोड़कर मायके चली गई थी और अपने साथ नकदी, जेवर तथा दो भूखंडों से जुड़े दस्तावेज ले गई थी। उसने मानसिक प्रताड़ना और दूसरी शादी के बेबुनियाद आरोप लगाए जाने का दावा करते हुए तलाक की मांग की थी। वहीं, पत्नी ने आरोपों का विरोध करते हुए कहा कि पति उसे बांझ कहकर प्रताड़ित करता था और उसी ने उसे घर से निकाला था। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति भरण-पोषण से बचने के लिए तलाक लेना चाहता है।
मामले के अनुसार, दोनों का विवाह 18 जून 1998 को भिलाई में हुआ था। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि पति ने शादी के शुरुआती 10 से 12 वर्षों तक किसी विवाद से इनकार किया था। वह यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि पत्नी मायके क्यों चली गई थी। अदालत के समक्ष पत्नी को वापस लाने के गंभीर प्रयासों या नकदी, जेवर और भूखंडों के दस्तावेज ले जाने के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं किए गए। पति मानसिक प्रताड़ना और परित्याग के आरोप साबित करने में भी नाकाम रहा। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
