आंदोलन संयमित हों-गिरीश पंकज

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दुनिया में कहीं भी आंदोलन हो, मगर संयम बरकरार रहे। यूरोप की सड़कों पर दिख रही अराजकता चिंता की बात है। वैसे यह उबाल अचानक नहीं फूटा है, बल्कि यह वर्षों से सुलग रहे आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असंतोष का विस्फोट है। इसके प्रमुख कारक आर्थिक संकट, मुद्रास्फीति और जीवन-यापन की लागत है। यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा संकट के बाद पूरे यूरोप में ऊर्जा, खाद्यान्न और आवास की कीमतें आसमान छूने लगीं। आम नागरिक की वास्तविक क्रय शक्ति में भारी गिरावट आई। फ्रांस में सेवानिवृत्ति की आयु 62 से बढ़ाकर 64 करना, जर्मनी और नीदरलैंड्स में कृषि नीतियों व ईंधन सब्सिडी में कटौती तथा ब्रिटेन में मुद्रास्फीति के दबाव ने मध्यवर्ग और श्रमिक वर्ग को सड़कों पर उतरने के लिए विवश किया। लोगों के मन में यह धारणा गहरी हुई कि सरकारें आम जनता की जेब काटकर कॉर्पोरेट या भू-राजनीतिक हितों को साध रही हैं। फ्रांस और पश्चिमी यूरोप के कई देशों में प्रवासियों और उनकी दूसरी-तीसरी पीढ़ी के युवाओं में गहरा परायापन है। पेरिस, ल्योन या मार्सिले जैसे महानगरों के बाहरी उपनगरों में रहने वाले युवा व्यवस्थागत उपेक्षा, बेरोजगारी और नस्लीय प्रोफाइलिंग का शिकार महसूस करते हैं। जब किसी पुलिस कार्रवाई में किसी किशोर की मृत्यु जैसी घटना होती है जैसे 2023 में नाहेल एम. की मृत्यु हुई, तो यह आक्रोश केवल एक घटना का विरोध न रहकर पूरी व्यवस्था के खिलाफ हिंसक प्रतिरोध का रूप ले लेता है। इसके उलट, भारत में हाल के वर्षों में हुए विशाल जनआंदोलन, चाहे वह दिल्ली की सीमाओं पर एक वर्ष से अधिक समय तक चला ऐतिहासिक किसान आंदोलन हो, या विभिन्न बेटियों को लेकर छात्र-कर्मचारी प्रदर्शन—अपने आकार और संवेदनशीलता के बावजूद व्यापक स्तर पर शांतिपूर्ण ही रहे। भारत में नागरिक प्रतिरोध की जड़ें स्वतंत्रता संग्राम के सत्याग्रह और अहिंसा के दर्शन में हैं। भारतीय जनमानस में यह समझ गहरे पैठी है कि हिंसा आंदोलन की नैतिक वैधता को समाप्त कर देती है। किसान आंदोलन के दौरान कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी और लंबे ठहराव के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने लंगर सेवा, साझा रसोई, चिकित्सा शिविर और खुले संवाद को अपना माध्यम बनाया, न कि महानगरों में आगजनी को। यूरोप के कई मौजूदा आंदोलन नेतृत्वहीन हैं, जो सोशल मीडिया के जरिए अचानक संगठित होते हैं और अराजक भीड़ में तब्दील हो जाते हैं। इसके विपरीत, भारत के आंदोलनों में किसान यूनियनों, खाप पंचायतों, मजदूर संगठनों और अनुभवी नेताओं का स्पष्ट नेतृत्व था। ये नेता आंतरिक अनुशासन बनाए रखने के लिए लगातार मंच से घोषणाएं करते थे और असामाजिक तत्वों पर नजर रखते थे। 26 जनवरी की लाल किला घटना जैसी दुर्भाग्यपूर्ण और अलग-थलग वारदात को छोड़ दें, तो आंदोलनकारियों ने व्यापक हिंसा से खुद को दूर रखा और प्रशासन के साथ बातचीत की मेज पर बैठे रहे। किसी भी आंदोलन के उग्र या शांत रहने में राज्य के सुरक्षा बलों की रणनीति और उनके संयम की भूमिका केंद्रीय होती है। भारतीय पुलिस और यूरोपीय पुलिस बलों के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर देखा गया। भारत में सुरक्षा बलों ने विषम परिस्थितियों में असाधारण धैर्य का परिचय दिया। दिल्ली की सीमाओं पर महीनों तक तैनात पुलिसकर्मियों ने पत्थरों, अपशब्दों और उकसावों का सामना किया, परंतु संयम नहीं खोया। पुलिस का मुख्य उद्देश्य सीधे टकराव से बचते हुए भीड़ को एक निश्चित दायरे तक सीमित रखना था। बहुस्तरीय सीमेंट के अवरोधक, कंटीले तार और वॉटर कैनन का उपयोग प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए किया गया, न कि उन पर हमला करने के लिए। इस रणनीति ने हताहतों की संख्या को न्यूनतम रखा।